पेरू में 'कोस्टल अल नीनो' (Coastal El Niño) के कारण भीषण बाढ़ और भारी बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। सरकार ने कई क्षेत्रों में आपातकाल घोषित किया है। जानिए इसका कृषि निर्यात और बुनियादी ढांचे पर क्या असर पड़ रहा है।

पेरू में 'कोस्टल अल नीनो' का कोहराम: भारी बारिश और बाढ़ से लाखों का जनजीवन प्रभावित

दक्षिण अमेरिकी देश पेरू इन दिनों प्रकृति के एक भीषण प्रकोप का सामना कर रहा है। 'कोस्टल अल नीनो' (Coastal El Niño) नामक एक मौसमी घटना ने देश के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है, जिसके कारण हो रही लगातार मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। सरकार को स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई क्षेत्रों में आपातकाल (State of Emergency) घोषित करना पड़ा है।

क्या है 'कोस्टल अल नीनो'?

अल नीनो (El Niño) एक ऐसी जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के गर्म पानी का प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर पड़ता है। 'कोस्टल अल नीनो' विशेष रूप से पेरू के तटों पर समुद्र का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने के कारण होता है। जब समुद्र का पानी गर्म होता है, तो वाष्पीकरण बढ़ जाता है, जिससे नमी से भरपूर बादल बनते हैं और ये बादलों के फटने जैसी स्थिति और अत्यधिक बारिश का कारण बनते हैं।

आपातकाल की स्थिति और नुकसान

फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत के साथ ही स्थिति और बिगड़ गई है। मिली जानकारी के अनुसार, पेरू के दर्जनों जिलों में भारी बारिश के कारण नदियां उफान पर हैं, जिससे निचले इलाकों में पानी भर गया है। भूस्खलन (Landslides) ने सड़कों और राजमार्गों को मलबे से पाट दिया है, जिससे परिवहन सेवा बुरी तरह बाधित हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हजारों घर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और कई क्षेत्रों में बुनियादी सेवाएं जैसे पानी और बिजली की आपूर्ति ठप है। सरकार ने इस स्थिति को संभालने के लिए त्वरित निधि और बचाव दल तैनात किए हैं, लेकिन आपदा का विस्तार इतना अधिक है कि राहत कार्य में भी काफी कठिनाई आ रही है।

कृषि निर्यात पर मंडराता खतरा

पेरू का कृषि क्षेत्र वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है, खासकर फल और सब्जियों के निर्यात में। लेकिन, इस बार की बाढ़ सीधे तौर पर उन खेतों और बागानों को निशाना बना रही है, जो पेरू की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

  • फलों की फसल: आम, ब्लूबेरी, अंगूर और एवोकैडो जैसे मुख्य निर्यात उत्पादों के बागान बाढ़ और जलभराव (Waterlogging) की चपेट में हैं।
  • फसल की गुणवत्ता: लंबे समय तक खेतों में पानी जमा रहने से न केवल फसल नष्ट हो रही है, बल्कि फंगल संक्रमण (Fungal diseases) का खतरा भी बढ़ गया है, जिससे बाकी बची फसल की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
  • आर्थिक नुकसान: कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाढ़ का प्रभाव लंबा खिंचता है, तो पेरू के निर्यात राजस्व में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे न केवल बड़े उद्योग बल्कि छोटे किसानों की आजीविका पर भी सीधा प्रहार होगा।

इंसानी जीवन और सुरक्षा

इस आपदा का सबसे दुखद पहलू इसका इंसानी प्रभाव है। कई परिवारों ने अपने घर खो दिए हैं और वे राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे नदियों के पास जाने से बचें और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों से दूर रहें। स्थानीय प्रशासन लगातार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की कोशिश कर रहा है।

आगे की चुनौती

मौसम विभाग की चेतावनियों के अनुसार, मार्च का महीना पेरू के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। गर्म समुद्री तापमान के कारण बारिश की तीव्रता कम होने के बजाय जारी रहने की संभावना है। ऐसे में बुनियादी ढांचे, जैसे कि सड़कें और पुल, जो पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, उनकी मरम्मत करना फिलहाल एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

यह आपदा हमें फिर से यह सोचने पर मजबूर करती है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का प्रभाव कितना वास्तविक और विनाशकारी हो सकता है। पेरू जैसे विकासशील देशों के लिए, जो अपनी अर्थव्यवस्था के लिए प्राकृतिक संसाधनों और कृषि पर निर्भर हैं, ऐसी आपदाएं दशकों पीछे धकेलने वाली होती हैं।

पेरू में स्थिति गंभीर है, लेकिन देश इस आपदा का डटकर सामना कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त कोशिशें ही इस त्रासदी से बाहर निकलने का रास्ता हो सकती हैं। फिलहाल, पेरू के लोगों की प्राथमिकता अपनी सुरक्षा है, और पूरी दुनिया की नजरें इस तटीय देश की ओर हैं, जो एक साथ एक कुदरती संकट और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है।

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