बुलंदशहर के NH-91 पर जुलाई 2016 की रात एक परिवार के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की भयावह घटना, उसकी जांच, लंबी कानूनी प्रक्रिया और 2025 में आए फैसले की पूरी कहानी। यह मामला महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े करता है।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग-91 पर जुलाई 2016 की एक अंधेरी रात ने न सिर्फ एक परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी, बल्कि देशभर में महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। दिल्ली-एनसीआर से निकलकर शाहजहांपुर की ओर जा रहा एक परिवार उस रात किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने के लिए सफर कर रहा था, लेकिन उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह यात्रा उनके लिए भयावह त्रासदी में बदल जाएगी।

29 और 30 जुलाई 2016 की मध्यरात्रि के करीब, बुलंदशहर के दोस्तपुर गांव के पास परिवार की कार अचानक एक भारी वस्तु से टकराई। झटके के कारण वाहन रुक गया। जब परिवार के सदस्य नीचे उतरे, तभी घात लगाए बैठे छह हथियारबंद बदमाशों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। बंदूक की नोक पर परिवार को काबू में लिया गया और पुरुष सदस्यों को रस्सियों से बांधकर बेरहमी से पीटा गया। उन्हें सड़क पर औंधे मुंह लेटने के लिए मजबूर किया गया, ताकि वे कुछ देख या विरोध न कर सकें।

इसके बाद आरोपियों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। परिवार की मां और उसकी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी को जबरन पास के खेतों में ले जाया गया, जहां दोनों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। यह वह क्षण था जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। अपराध को अंजाम देने के बाद आरोपी परिवार से नकदी और कीमती सामान लूटकर अंधेरे का फायदा उठाते हुए फरार हो गए।

घटना की भयावहता सामने आते ही पूरे देश में आक्रोश फैल गया। सवाल यह उठने लगे कि एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर, जहां लगातार यातायात रहता है, वहां इस तरह की वारदात कैसे हो सकती है। स्थानीय पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर भी गंभीर आरोप लगे। जांच में देरी और लापरवाही के आरोपों के चलते कई पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की गई। बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपी गई।

जांच एजेंसी ने मामले में अपहरण, डकैती, सामूहिक दुष्कर्म और नाबालिग से अपराध से जुड़े कड़े कानूनों के तहत आरोप तय किए। लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कई गवाहों के बयान दर्ज हुए, साक्ष्यों की बारीकी से जांच की गई और वर्षों तक सुनवाई चलती रही। यह मुकदमा भारतीय न्याय व्यवस्था की धीमी गति का भी प्रतीक बन गया, क्योंकि पीड़ित परिवार को इंसाफ के लिए लगभग नौ साल तक इंतजार करना पड़ा।

आखिरकार दिसंबर 2025 में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने माना कि अपराध की प्रकृति अत्यंत क्रूर और अमानवीय थी, और समाज में ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश देना जरूरी है। यह फैसला भले ही देर से आया, लेकिन इसे पीड़ितों के लिए न्याय की दिशा में एक अहम कदम माना गया।

इस घटना का असर केवल उस रात तक सीमित नहीं रहा। पीड़ित परिवार को वर्षों तक सामाजिक दबाव, मानसिक आघात और असुरक्षा का सामना करना पड़ा। बार-बार ठिकाने बदलने की मजबूरी और सामान्य जीवन से कटाव उनकी रोजमर्रा की सच्चाई बन गई। यह मामला आज भी देश को याद दिलाता है कि कानून, सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता में चूक की कीमत कितनी भारी हो सकती है। बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप कांड सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि जब तक महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं समाज की अंतरात्मा को झकझोरती रहेंगी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

Next Story