सिक्किम के राज्यपाल ओमप्रकाश माथुर के जन्मदिन पर विशेष लेख: जानिए कैसे फालना के एक अश्वारोही स्वयंसेवक ने अपनी संगठन शक्ति और रणनीतिक कौशल से भारतीय राजनीति में 'संकटमोचक' की पहचान बनाई। जीरा आंदोलन से लेकर भैरोंसिंह शेखावत की सरकार बचाने और राजभवन तक के उनके प्रेरक सफर की पूरी कहानी यहाँ पढ़ें।

जयपुर/गंगटोक। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी पहचान पदों से नहीं, बल्कि उनके ध्येयनिष्ठ जीवन और संगठन के प्रति अटूट समर्पण से होती है। वर्तमान में सिक्किम के राज्यपाल के संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहे ओमप्रकाश माथुर का जीवन इसी समर्पण और अनुशासन की एक जीवंत मिसाल है। 2 जनवरी को उनके जन्मदिन के विशेष अवसर पर, उनके जीवन का हर अध्याय—एक अश्वारोही स्वयंसेवक से लेकर कुशल रणनीतिकार और महामहिम तक—भारत की लोकतांत्रिक विकास यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज जान पड़ता है।

घोड़े की लगाम से संगठन की कमान तक: एक अविस्मरणीय शुरुआत

ओमप्रकाश माथुर के सार्वजनिक जीवन की नींव 1971 में फालना (पाली) के एक 'पथ संचलन' के दौरान पड़ी। संचलन में संघ के ध्वज को लेकर चलने वाला घोड़ा अचानक बिदक गया, जिससे तत्कालीन स्वयंसेवक गणपत सोनी उसे नियंत्रित नहीं कर पाए। उस संकट के समय जिला प्रचारक विद्याधर पालीवाल को माथुर की घुड़सवारी के शौक का स्मरण हुआ। माथुर ने न केवल उस अश्व को नियंत्रित किया, बल्कि संघ की गणवेश पहनकर पूरे गौरव के साथ भगवा ध्वज थामकर संचलन का नेतृत्व किया। यहीं से उनके जीवन में राष्ट्रभक्ति के संकल्प का बीजारोपण हुआ और 1972 में उन्होंने ब्रह्मदेव जी, सोहनसिंह जी और लक्ष्मणसिंह जी शेखावत जैसे वरिष्ठ प्रचारकों के मार्गदर्शन में प्रचारक के रूप में स्वयं को माँ भारती को समर्पित कर दिया।

किसान संघर्ष और 'जीरा आंदोलन' की ऐतिहासिक विजय

माथुर की संगठन शक्ति का लोहा तब माना गया जब उन्होंने भारतीय किसान संघ के राजस्थान प्रदेश संगठन मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। 80 के दशक का प्रसिद्ध 'जीरा आंदोलन' उनकी नेतृत्व क्षमता का प्रमाण बना। जालौर और सिरोही के किसानों को गुजरात के ऊंझा में जीरा बेचने पर लगी पाबंदी के खिलाफ उन्होंने 250 ट्रैक्टरों के साथ मण्डारडी चौकी पर मोर्चा खोल दिया। इंडियन एक्सप्रेस जैसे राष्ट्रीय मीडिया ने इस संघर्ष को प्रमुखता दी। परिणामतः, तत्कालीन बिक्री कर आयुक्त पी.एन.भंडारी और एसडीएम दीपक उप्रेती को मौके पर आकर नियम बदलने के आदेश जारी करने पड़े। इस सफलता ने तत्कालीन कद्दावर नेता भैरोंसिंह शेखावत का ध्यान अपनी ओर खींचा और 1989 में वे भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री बनाए गए।





रणनीतिक चातुर्य: जब शेखावत को मिली अपरिहार्य जीत

राजनीतिक इतिहास में 1993 का चुनाव माथुर की दूरदर्शिता के लिए जाना जाता है। जब भैरोंसिंह शेखावत ने केवल श्रीगंगानगर से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, तो माथुर ने जमीनी फीडबैक के आधार पर उन्हें बाली सीट से भी चुनाव लड़ने का आग्रह किया। शेखावत की नाराजगी के बावजूद, माथुर ने भाजपा नेता पुष्प जैन के माध्यम से बाली से उनका नामांकन दाखिल करवाया। अंततः शेखावत केवल बाली से ही चुनाव जीत पाए, और माथुर की इस 'पॉलिटिकल इंजीनियरिंग' ने राजस्थान में भाजपा की सत्ता वापसी सुनिश्चित की।

राष्ट्रीय राजनीति के 'संकटमोचक' और संवैधानिक दायित्व

ओमप्रकाश माथुर का कद भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदरसिंह भंडारी, नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह और रामदास अग्रवाल जैसे दिग्गजों के साथ काम करते हुए निरंतर बढ़ता गया। वे गुजरात के प्रभारी रहे और महाराष्ट्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने के मुख्य रणनीतिकार बने। राज्यसभा सांसद के रूप में विधायी कार्यों के बाद, अब वे राजभवन की गरिमा को बढ़ा रहे हैं। सादगी ऐसी कि वर्षों तक कर्नल लक्ष्मणसिंह शेखावत के गैराज से संगठन चलाया, और आज भी वे अपने कार्यकर्ताओं के लिए 'ओमजी भाई साहब' ही हैं।

डॉ. विजय विप्लवी के अनुसार, माथुर का व्यक्तित्व वाजपेयी की उदारता, आडवाणी की दृढ़ता और मोदी की निर्णायक कार्यशैली का संगम है। उनके 74वें जन्मदिन पर यह लेख उनके उस सफर को नमन करता है जो 'चरैवेति-चरैवेति' के मंत्र पर आधारित है।

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