प्रातःकाल समाचार पत्र के वरिष्ठ संपादक द्वारा लिखित इस विशेष यात्रा वृतांत में पढ़ें प्रधानमंत्री के साथ दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया दौरे की तैयारियों का सजीव चित्रण। 'येलो फीवर' टीकाकरण की जद्दोजहद से लेकर दिल्ली के बदलते इंफ्रास्ट्रक्चर तक, एक वरिष्ठ पत्रकार की नजर से कूटनीतिक यात्रा के अनछुए पहलुओं और अनुभवों का रोचक विवरण।

वेबसाईट पर अपनी स्वीकृति प्रेषित करने के पश्चात् मुझे यह चिन्ता सताने लगी कि मेरी स्वीकृति उन्हें मिली भी कि नहीं, कहीं ऐसा न हो कि स्वीकृति नहीं मिलने पर मेरा नाम कट जाय। इस व्यग्रता में में श्मशान से आने के पश्चात् अब तक नहाया भी नहीं था। निमंत्रण के फेक्स पर कुछ फोन नम्बर भी लिखे थे, मैंने सोचा इन्हें फोन कर इतना तो अवगत करा दूं कि मैंने अपनी स्वीकृति वेब साइट पर सबमिट कर दी है।

विदेश मंत्रालय फोन किया तो वे अचरज करने लगे और बोले कि अभी तो हम सभी पत्रकारों को निमन्त्रण के फैक्स भेज भी नहीं पाये हैं और आपने अपनी स्वीकृति भेज भी दी, वे भी मेरी व्यग्रता पर हंसने लगे बोले कि अभी तो हमें भी पता नहीं है कि यात्रा का कार्यक्रम क्या हैं। उन्होंने यह सुझाव जरूर दिया कि जो सामग्री आपने इन्टरनेट पर प्रेषित की है उसके प्रिन्ट निकाल कर तथा अपना पासपोर्ट और कुछ चित्र लेकर किसी को दिल्ली भेज देंगे तो ठीक रहेगा

उस दिन शुक्रवार था और अगले दो दिन छुट्टियों के थे इसलिये सोमवार को ही किसी को दिल्ली भेजने की सोची। यूं तो दिल्ली में अपना ऑफिस है, लोग हैं, लेकिन पासपोर्ट, फोटो और पत्र लेकर तो किसी को भेजना ही था इसलिये सोमवार को जैन सा. को यह सब लेकर दिल्ली भेजने का निश्चय किया।

शाम को मधुबन की दादाबाड़ी में स्व. अमरसिंह नाहर का उठावना था। दादाबाड़ी का विशाल प्रांगण चारों तरफ से खचाखच भर गया था और लोग थे कि निरन्तर आये जा रहे थे। उठावने के पश्चात् प्रो. राजेन्द्र तलेसरा फिर मिल गये। मैंने उनसे कहा कि मैं दक्षिण अफ्रीका जा रहा हूं। वे हंसने लगे और बोले कि सुबह मैं मजाक कर रहा था और अब आप कर रहे हैं। मैंने कहा नहीं, मजाक नहीं कर रहा हूं, सच कह रहा हूं। जब उन्हें लगा कि मैं वाकई गंभीर हूं तो पूछा कि और कौन जा रहा है। मैंने कहा मनमोहन सिंह, मगर इस नाम का कोई व्यक्ति हमारी परिचय मंडली में नहीं था तो उन्होंने पूछा कि कौन मनमोहन सिंह, इस पर मैंने कहा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। मेरे इस उत्तर पर आसपास हमारी बात सुन रहे सभी मित्र और स्वयं तलेसरा भी हंसने लगे. सभी को यकीन हो गया कि मैं टांग खिंचाई कर रहा हूं। मैं बहुत मुश्किल से उन्हें जब अपनी बात का विश्वास दिला पाया तो वे कहने लगे, हां हां आप पहले भी तो गये थे। अब प्रो. तलेसरा बोले कि आप जा रहे हैं तो मेरे बेटे के लिए कुछ सामान लेते जाना। मैं समझ गया जरूर नमकीन भेजनी होगी क्यूंकि यह ऐसी चीज है कि आदमी चाहे कहीं भी रहे, नमकीन उसे अपने घर की अपने शहर की ही चाहिये। हमारे यहां भी जयपुर और मुंबई के घरों में नमकीन उदयपुर से ही जाती है. ऐसा नहीं है कि वहां नमकीन की कोई कमी है। जब मैंने तलेसरा से पूछा कि क्या नमकीन भेजनी है तो वे हंस पड़े और बोले, हां थोड़ी नमकीन और कुछ सामान । मैंने कहा अभी तो यात्रा की तिथियां तय नहीं है लेकिन है अगले माह सो आप वापस सम्पर्क कर लेना।

अगले दिन शनिवार 22 सित को 20-20 वर्ल्ड कप में भारत ने जास्ट्रेलिया की सेमी फाइनल में हरा फाइनल में प्रवेश कर लिया था। टी.वी. पर जब यह मैच देख रहा था तो मेरा नजरिया पूरी तरह बदल चुका था, अब मैं सोच रहा था कि कुछ ही दिनों में मैं भी द. अफ्रीका में होऊंगा। मैं मैदान में उपस्थित दर्शकों के वस्त्रों को ध्यान से देखने लगा कि वहां मौसम कैसा है, ज्यादा ठंड तो नहीं है। दर्शक अधिकतर हल्के फुल्के वस्त्र ही पहने थे. • जिससे लगता था कि मौसम अपने यहाँ जैसा ही है।

रविवार की शाम को हमारे मैनेजर जैन सा. दिल्ली जाने वाले थे ताकि सोमवार को शास्त्री भवन पहुँच सकें जहां विदेश मंत्रालय का कार्यालय है, लेकिन उन्हें टिकिट नहीं मिला वेटिंग लिस्ट लम्बी थी. सभी श्रेणियों भरी हुई थी. छुट्टी का दिन होने से वी.आई.पी. कोटे का आवेदन भी नहीं दे सके थे। मुझे गुस्सा आ रहा था. पर कोई कर भी क्या सकता

था। सोमवार की सुबह ही विदेश मंत्रालय फोन लगाया तो पता चला कि अभी तक बीजा फार्म ही नहीं आ पाये हैं, इनके कल तक आने की उम्मीद है। मुझे तसल्ली हुई कि चलो ठीक रहा वरना जैन सा. का वहाँ जाना बेकार ही जाता। रात को 20-20 का फाईनल मैच था और यह जोहन्सबर्ग में हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी से वहां पहुँच गया हूं। भारत की शानदार जीत ने मेरे अतिरेक में और वृद्धि ही की ।

मंगलवार 25 सित. को सुबह ही जैन सा. ने शास्त्री भवन से बीजा फार्म इत्यादि ले लिये और वांछित सामग्री उन्हें सौंप दी। उन्हें बताया गया कि इन फार्मों को भर कर लाने के साथ येलो फीवर का प्रमाण पत्र साथ में लाना जरूरी है। यात्रा की तिथियां भी 13-14 अक्टू. के आसपास बताई ।

येलो फीवर के बारे में इधर-उधर पता किया तो किसी को कुछ पता नहीं, डायग्नोस्टिक सेन्टरों में पूछा तो उन्हें भी पता नहीं, वापस मंत्रालय में पूछा तो उन्होंने बताया कि जयपुर में शायद इसका प्रमाण पत्र मिल जाये। मैंने अपने भतीजे संदीप गोयल को जयपुर फोन किया और इस बारे में पता करने को कहा ।

संदीप का वापस फोन आया और उसने बताया कि जयपुर में भी किसी को पता नहीं कि येलो फीवर का सर्टिफिकेट कहां से मिलता है। उसने एक बड़े डायग्नोस्टिक सेन्टर में पूछा तो वे बताने लगे कि एक तो होता है डेंगू, एक होता है मलेरिया लेकिन येलो फीवर जैसा कुछ नहीं होता।

अब मैं चिन्तित हो गया कि येलो फीवर का सर्टिफिकेट कहां से मिलेगा। येलो फीवर का नाम जरूर मैंने सुना था और इस बीमारी के अफ्रीका में होने का भी थोड़ा ध्यान था. अफ्रीका में पाई जाने वाली टीसी टीसी मक्खियों से शायद यह बीमारी होती थी। इससे ज्यादा मुझे कुछ पता नहीं था। इन्टरनेट पर गया तो पता चला कि येलो फीवर नामक बीमारी जिसे अमेरिकन प्लेग भी कहते हैं अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों में बहुत प्रचलित है। येलो फीवर एक महामारी के रूप में प्रसिद्ध है। कई वर्षों पूर्व इस महामारी की चपेट में पूरी फ्रांसीसी सेना आकर समूल नष्ट हो गई थी। यह प्लेग की तरह फैली और समूचे पश्चिमी अर्ध गोलार्द्ध को अपनी चपेट में ले लिया। इस बीमारी का टीका तैयार करने के लिए की गई शोध में कई मनुष्यों ने अपने आपको प्रस्तुत किया जिसमें कई लोग अपनी जान भी गंवा बैठे लेकिन अन्ततः इसका टीका तैयार किया गया तथा इस महामारी को रोकने के प्रयास शुरू हो गये।

टीके के बावजूद आज भी हर साल 2 लाख से अधिक लोग अफ्रीकी देशों, जिनमें विकसित राष्ट्र भी शामिल है, इसकी चपेट में आते हैं और इनमें से 30 हजार से अधिक लोग मारे जाते हैं। यह बीमारी एडीस सिम्पसलोनी मच्छर के काटने से होती है। इस जानकारी के बाद मुझे और टेन्शन हो गया इसकी जांच के बारे में कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था। मैं सोच रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि अफ्रीका जाकर लेने के देने पड़े।

वापस शास्त्री भवन में पता किया कि येलो फीवर की जांच कहां कराएं तो उन्होंने बताया कि चिन्ता की कोई बात नहीं है, कहीं भी नहीं होती होगी तो दिल्ली में तो होती ही है... उन्होंने यह भी बताया कि आप किसी ट्रेवल एजेन्ट से पूछेंगे तो शायद उनसे भी जानकारी मिल सकती है इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सर्टिफिकेट तभी वैध माना जायगा जब यह यात्रा की तिथि के 10 दिन पूर्व जारी किया गया हो। इस चेतावनी से टेन्शन और बढ गया। वैसे अभी 26 ता. ही हुई थी। यात्रा में 17 दिन बाकी थे और सर्टिफिकेट लेने में 7 दिन । अब मैंने उदयपुर स्थित के. टूर्स के कोमल कोठारी से बात की। उन्होंने अन्य लोगों की तरह जरा भी अचरज नहीं किया और बताया कि अहमदाबाद में इसके सर्टिफिकेट मिल जायेंगे। वे अफ्रीका जाने वाले अपने ग्राहकों को अहमदाबाद ही भेजते हैं।

अब सवाल यह था कि जांच के लिये अहमदाबाद जाया जाये या दिल्ली। वैसे कुछ कागजातों पर हस्ताक्षर के लिये दिल्ली जाना ही था इसलिये दिल्ली जाने का ही तय किया। 26 की शाम को ही मैं ट्रेन से जयपुर निकल गया। ट्रेन अगले दिन सुबह डेढ़ दो घंटे लेट पहुंची। उदयपुर जयपुर के बीच चलने वाली इस ट्रेन का यही आलम है, रोजाना दोनों जगह लेट पहुंच रही है। ताज्जुब तो इस बात का है कि चित्तौड़- अजमेर के बीच बड़ी लाईन शुरू हुए अर्सा हो चुका है इसके बावजूद भी 100 कि. मी. का अतिरिक्त फेरा लगाते हुए यह ट्रेन कोटा होकर चलाई जा रही है। आमान परिवर्तन के पहले जो चेतक एक्सप्रेस भीलवाड़ा अजमेर होकर चलाई जाती थी उसे पुनः चलाने में क्या कठिनाई है। रेल मंत्रालय न जाने क्यूँ इस क्षेत्र की आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दे रहा। उदयपुर से मुंबई के बीच जो ट्रेन चलाई गई है वह भी नाम की उदयपुर से है क्यूंकि उदयपुर से जयपुर जाने वाली ट्रेन में ही इसके कुछ डिब्बे जाते हैं जो चित्तौड़ में अजमेर से आने वाली अजमेर-बांद्रा ट्रेन में जुड़ जाते हैं वह भी हफ्ते में सिर्फ तीन दिन ।

उदयपुर से प्रतिदिन मुंबई के लिये एक सीधी ट्रेन चलाने में क्या कठिनाई है समझना मुश्किल है क्यूंकि वर्तमान की आंशिक व्यवस्था में जितनी भीड़ रहती है उससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मार्ग पर ट्रेन की कितनी आवश्यकता है। इसी तरह से उदयपुर से इन्दौर के बीच भी पूर्व की तरह एक सीधी ट्रेन बहुत जरूरी है। मेवाड़ और मालवा राजनीतिक दृष्टि से भले ही अलग अलग प्रान्तों में हों मगर सामाजिक, सांस्कृतिक और एतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त निकट हैं इसलिये इन दोनों क्षेत्रों को जोड़ने के लिये रेल सम्पर्क पुनः स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है। पता नहीं रेल मंत्रालय की क्या प्राथमिकताएं हैं या उदयपुर जी कि कांग्रेस और भाजपा का गढ़ है, एक गैर कांग्रेसी गैर भाजपाई रेल मंत्री होने की कीमत चुका रहा है।

दिल्ली में 3 केंद्र हैं जहां येलो फीवर का टीका लगता है और बाद में उसका प्रमाण पत्र मिलता है। जैन सा. यह सारा विवरण लेकर जयपुर आ गये थे। ये तीनों केंद्र अलग अलग दिन अलग अलग समय यह टीका लगाते थे। आज 27 हो गई थी, मैं सोच रहा था आज ही यह काम निपटा लें, लेकिन उस केंद्र में टीका सुबह लगता था और वहां जाते जितने समय निकल जाता था। अगले दिन दोपहर को 2 बजे नई दिल्ली महानगर पालिका के एक केंद्र में टीका लगता था। हमने इसी केंद्र को चुना और अगले दिन सुबह बस से दिल्ली के लिये निकलना तय किया।

दिल्ली-जयपुर के बीच रोडवेज की कई सेवाएं हैं। इनमें वोल्वो बेहतरीन है। सिल्वर लाइन बसें भी इस मार्ग पर चलती हैं। जिनमें पत्रकार होने के नाते हम निशुल्क यात्रा कर सकते हैं। यह सुविधा वोल्वो में नहीं है। मैं तो सिल्वर लाईन से जाने का ही मन बना रहा था लेकिन संदीप ने वोल्वो के टिकट मंगा लिये। मैं सोच रहा था एक बार येलो फीवर के सर्टिफिकेट का काम निपट जाये तो फिर मुंबई चला जाऊं क्यूंकि कुछ आवश्यक कार्यों से वहां जाना जरूरी था। संदीप ने कहा मुंबई जाना ही है तो वापस जयपुर आकर क्या करोगे, वहीं से मुंबई निकल जाना। दिल्ली - मुंबई के बीच ढेर सारी विमान उड़ानें हैं जो बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध हो जाती है। मैंने यही करना ठीक समझा।

अगले दिन सुबह में जैन सा. के साथ दिल्ली के लिये निकल गया। पोल्यो बसें मुझे बहुत आरामदायक और अत्याधुनिक लगी। इनकी गति भी अच्छी होती है और यात्रियों को इसका पता भी नहीं चलता। रोडवेज ये बसें सिर्फ जयपुर-दिल्ली मार्ग पर ही चला रहा है। एसी बसें अगर उदयपुर जयपुर या राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में भी चलाई जाये तो यात्रियों के लिये काफी सुविधा हो जायेगी।

थोड़ी ही देर में हम बहरोड़ पहुंच गये। जयपुर- दिल्ली मार्ग का बहुत तेजी से विकास हो रहा है। इस मार्ग पर यात्रा करते हुए यह आसानी से अहसास किया जा सकता था। पूरे मार्ग पर सड़क की दोनों ओर कई स्थाई निर्माण हो चुके थे और छोटे छोटे गांव वृहद रूप लेकर हाईवे पर ट्राफिक जाम की समस्या उत्पन्न कर रहे थे। जयपुर से दिल्ली जाते हुए या आते हुए सभी बसें कारें आदि बहरोड़ स्थित राजस्थान पर्यटन विकास निगम के मिडवे रेस्टोरेन्ट पर रूकती ही है। यात्री गण भी यहां खा-पी कर अपनी यात्रा का आनंद द्विगुणित करते रहे हैं। मैंने भी सुबह से कुछ खाया नहीं था. दवाईयां भी लेनी थी इसलिये बहरोड पर जब बस रुकी तो हम भी के अल्पाहार के लिये रेस्टोरेन्ट में घुस पड़े। यह मिडवे वर्षों से अपनी सामग्री, सुविधा और सेवा के लिये प्रसिद्ध रहा है। सामग्री तो इस बार भी मुझे श्रेष्ठ लगी लेकिन सुविधा और सेवा में जरूर शिथिलता दृष्टिगोचर हुई। शौचालय गंदे पड़े थे, फ्लश चल नहीं रहे थे, रेस्टोरेन्ट में भी कूपन लेने के लिये यात्रियों की लंबी लाइन लगी थी लेकिन काउन्टर पर एक ही व्यक्ति था जबकि यहां दो तीन व्यक्ति निरन्तर रहते हैं।

जयपुर- दिल्ली मार्ग पर दो-तीन जगह टोल टैक्स वसूला जाता है तथा एक दो स्थानों पर और टोल नाके बनाये जा रहे हैं। अभी सौ सवा सौ रू. वसूले जा रहे हैं जो बढ़ - कर दो सौ तक हो सकते हैं। इतना शुल्क वसूले जाने के बावजूद इस मार्ग की हालत अत्यन्त शोचनीय है। दिन-दिन बढ़ती जमीनों की कीमतों की वजह से स्थान स्थान पर सड़क की दोनों तरफ कई स्थाई निर्माण उभर आये है। मार्ग पर स्थित छोटे छोटे गांवों की हालत यह हो गई है कि भीड़ भाड़ के कारण वहां से वाहन का गुजरना मुश्किल हो जाता है। इस सबके बावजूद पूरे मार्ग पर एक भी स्थान पर ओवरब्रिज नहीं बना हुआ है। जयपुर किशनगढ़ राजमार्ग पर जिस तरह भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में ओवर ब्रिज बनाकर राजमार्ग को निर्बाध बनाया गया है वैसे ही जयपुर - दिल्ली मार्ग को निर्बाध नहीं बनाया जाता तो इसे राजमार्ग का दर्जा देना या इस मार्ग पर इतना शुल्क वसूलना निरर्थक है।

अभी हमारे यहां मानसिकता यह है कि जहां कहीं सड़क बनी नहीं कि उसके दोनों तरफ दुकानें, ढाबे, रेस्टोरेन्ट आदि बन जाते हैं। यदि राजमार्ग को हमें निर्बाध बनाना है तो उन्हें पश्चिमी देशों की तरह 'फ्री वे' बनाना होगा। राजमार्ग को 'नो मेन्स लेण्ड' बनाकर इसे दोनों तरफ से निर्माण मुक्त नहीं बनाया गया तो हर राजमार्ग कुछ ही वर्षों में भीड़भाड़ वाला क्षेत्र बन जाएगा। अभी राजमार्गों पर उस प्रान्त का शासन चलता है जिस प्रान्त से होकर वे गुजरते हैं। राजमार्ग प्राधिकरण या अन्य किसी केंद्रीय अभिकरण के पास इस तरह के निर्माणों को नियंत्रित करने की कोई शक्ति नहीं है।

शीघ्र ही हम हरियाणा की सीमा में प्रविष्ठ कर गये। सड़क की दोनों तरफ पेट्रोल पम्पों की एक श्रृंखला सी नजर आने लगी जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक साथ इतने पेट्रोल पम्पों की सार्थकता विचारणीय है क्यूंकि हरियाणा सीमा के पूर्व राजस्थान की सीमा में कहीं कहीं ही ये पम्प नजर आते थे अब हम दिल्ली के पास पहुंच रहे थे, पहले तो गुड़गांव शुरू हुआ नहीं कि लगता था दिल्ली शुरू हो गया लेकिन अभी तो गुड़गांव बहुत दूर था और लग ऐसा रहा था दिल्ली आ गया है। मानेसर से ही ऊंची ऊंची इमारतों और मोड़ भाड़ वाले क्षेत्र शुरू हो गये थे। यह तेजी से बदलते हुए आर्थिक परिदृश्य की एक झलक थी।

थोड़ी देर में हम वाकई दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर गये और इसके साथ ही शुरू हो गया फ्लाई ओवरों, ओवर ब्रिजों और निर्माणाधीन पुलों और सड़कों का निर्बाध सिलसिला। जब भी मैं दिल्ली आता हूं कुछ नये ओवर ब्रिज, नई सड़कें और नये निर्माण नजर आते ही हैं। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से दिल्ली का कायाकल्प हुआ है उससे कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि सारे देश के विकास का पैसा मानों दिल्ली में ही उण्डेला जा रहा हो। मुंबई देश की औद्योगिक राजधानी है और पूरे देश को सर्वाधिक राजस्व उपलब्ध कराती है फिर भी इसके विकास पर इतना ध्यान नहीं है। मुंबई की विशेष भौगोलिक परिस्थितियां है इस वजह से जन सुविधाओं का जो आधारभूत ढांचा इस तरह की भौगोलिक रचनाओं वाले विश्व के अन्य महानगरों में है उसका न्यूनाधिक भी यहां नहीं है। अब कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर दिल्ली में धन का पिटारा और खुल गया है जिससे निर्माण की गतिविधियां और अधिक ही देखने को मिलेंगी।

हमारी बस बीकानेर हाउस रूकी। यहां रोडवेज का सामान अमानती कक्ष है जहां हमने अपना सामान जमा करा दिया क्यूंकि शाम को वापस निकलना था। धुकधुकी इस बात की ही लगी हुई थी कि तब तक हमारा काम पूरा भी होगा कि नहीं। दोपहर के एक बजने वाले थे, शास्त्री भवन में लंच हो गया होगा और टीके के लिए दो बजे का समय था इस कारण हमने भी तब तक भोजन का काम पूरा करने की सोची। पास ही एक रेस्टोरेन्ट था, ज्यादा भूख भी नहीं थी, दोनों ने सिर्फ दाल-रोटी और चावल खाये जिसमें ढाई सौ का बिल बन गया। मेरा माथा चकरा गया, अब कुछ हो भी नहीं सकता था, मेनू कार्ड में दरें छपी हुई थी। गलती हमारी भी कि हमने पहले देखा नहीं।

दिल्ली महानगर पालिका का अस्पताल वा टीका केंद्र, जो भी हो, थोड़ा दूर था। हमने ओटो रिक्शा किया। यहां सभी ओटो हरे और पीले रंग में रंगे होते हैं, ये सभी सी. एन. जी. गेस से चलते हैं। मुंबई में तो सी. एन. जी. गेस से चलने वाले ओटो भी काले-पीले ही होते है। यहां सभी ओटो में कम्प्यूटराईज मीटर भी लगे थे पर कोई रिक्शा मीटर से नहीं चलता, सभी डेढे दुगुने किराये मांगते हैं, यदि आप थोड़ा बहुत कम करा पाओ तो आपकी किस्मत। दो बजे तक हम अस्पताल पहुंच गये। वहां जाते ही येलो फीवर के टीके के बारे में पूछा तो एक आदमी ने एक कमरे की तरफ ईशारा किया और कहा वहां बैठ जाओ। मैंने सोचा शायद यह समझा नहीं है, हमें इसने साधारण मरीज समझ लिया है और एक तरफ बैठने को कह दिया है। मैंने उसे वापस कहा हमें येलोफीवर का टीका लगवाना है मेरा अन्दाज ऐसा था जैसे कोई बहुत बड़ा काम करवाना हो। इस बार उस आदमी ने झुंझलाते हुए कहा हो भाई हां उस कमरे में बैठ जाओ अंदर गये तो पूरा कमरा खचाखच भरा हुआ था। बैठने की जगह भी नहीं थी. सबके हाथों में पासपोर्ट थे और सब यही टीका लगवाने आये थे।

थोड़ी देर बाद वही आदमी जिसने हमें अंदर भेजा था आया और मेरे हाथों में एक टोकन थमा गया। इस पर 22 न. लिखे थे, और लोग आते रहे और वह आदमी उन्हें टोकन देता रहा। मैंने चारों तरफ नजरें घुमा कर देखा, शायद कोई परिचित पत्रकार दिख जाये मगर कोई नजर नहीं आया। कमरे में अलग अलग किस्म के लोग थे। कुछ मजदूर जैसे दिख रहे थे, कुछ छात्र भी थे. कुछ परिवार वाले थे जो बाल बच्चों सहित उपस्थित थे।

यह कमरा एक अन्य कमरे से जुड़ा था। दोनों के बीच एक खिड़की थी. जिससे उस कमरे का दृश्य नजर आ रहा था। पास वाले कमरे की खिड़की से अब एक मास्टरनी टाईप महिला प्रकट हुई और उसने सबको डांटते हुए चुप रहने को कहा। उसके हाथों में पीले रंग के कुछ कार्ड थे। वह बोली 1 से 20 नं. तक टोकन वाले आ जायें बाकी सब लोग अपने स्थानों पर ही रहें, उनका क्रम बाद में आयेगा। मेरा नं. 22 था, मैं सोचने लगा, पहले ये सब लोग निपटेंगे तब मेरा नं. आयगा । ये सारे लोग 2 बजे से पहले ही यहां आकर टोकन लेकर बैठ गये थे। मैंने जैन सा. को बोला अपन ने फालतू में ही खाना खाने में समय व्यर्थ किया। अगर सीधे यहां आ जाते तो अपना भी पहले नंबर लग जाता। मैंने उन्हें इस महिला जो कि शायद डाक्टर थी, क्यूंकि उसने एपरन पहन रखा था, के पास भेजा और कहा कि उसे कहें कि हमें थोड़ी जल्दी है, हम प्रधानमंत्री की टोली में जा रहे है इसलिये हमें प्राथमिकता दे दे।

इस बीच शुरू के 20 लोग कार्ड लेने उठ गये थे, तो सीटें खाली हो गई और मैं एक पर जम गया। महिला ने वे सारे कार्ड 20 लोगों में बांट दिये और सबको अपने नाम, पासपोर्ट नं. और जन्म दिन इन पर लिखने को कहा। प्रत्येक को 150 रू. तैयार रखने को कहा। मैंने सोचा 150 रू. फीस तो ठीक है। पहले मुझे लग रहा था कि फीस शायद ज्यादा हो ।

अब एक एक कर के लोग पास वाले कमरे में जाने लगे। डाक्टर महिला शायद किसी अन्य कमरे में बैठती थी। थोड़ी ही देर में जैन सा. हंसते हुए वापस आये, वे डा. से मिले थे और अपनी बात बताई थी। डाक्टर ने टस से मस नहीं होते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री के हों या राष्ट्रपति के यहां नंबर से काम चलता है। आपको पहले ले लूं तो बाकी को क्या जवाब दूंगी।

अब हम अपनी बारी का इन्तजार करने लगे। इस बीच मेरे एक परिचित पत्रकार श्री सुरेश बाफना आ गये। वे नई दुनिया के रेजिडेन्ट एडीटर हैं। प्रधानमंत्री के साथ मेरी पूर्व की पाकिस्तान और थाईलेण्ड की यात्रा में वे मेरे साथ थे। बाद में दो पत्रकार और आये जो हमा साथ ही जाने वाले थे। इसमें एक तो हिन्दुस्तान टाईम्स के पंकज वोरा थे और एक किसी मलयाल चैनल से जुड़े थे। मैं इन्हें नहीं जानता था, सुरेश बाफना ने ही इनसे परिचय कराया।

अब हमें भी पीले कार्ड भरने को दे दिये गये। टीका लगाने का काम शुरू हो गया था। पास वाले कमरे में रुपये जमा करवा कर एन्ट्री हो रही थी और उससे पास वाले कमरे में वह महिला डाक्टर टीके के इंजेक्शन लगा रही थी। कार्ड को सर्टिफाई करने का काम एक अन्य कमरे में अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कर रहे थे। अस्पताल में अन्य कोई चिकित्सा गतिविधि नजर नहीं आ रही थी। लगता था जैसे यह कोई प्रशासनिक कार्यालय हो ।

थोड़ी ही देर में महिला डाक्टर की जोर जोर से आवाज आने लगी। वह एन्ट्री कर रहे कर्मचारियों को सुना सुना कर चिल्ला रही थी, शायद उसकी किसी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी से शिकायत कर दी थी। अधिकारी ने डाक्टर को बुला कर कुछ कहा होगा इसलिये वह भड़क रही थी कि शिकायत करने वाला हिम्मत हो तो उसके सामने आकर कुछ कहे। इस व्यवधान से टीके लगने का काम रूक गया लेकिन एन्ट्री करने का काम जारी रहा जिससे डाक्टर के कमरे के बाहर भीड़ लग गई। दो तीन लोग अन्दर चले गये तो डाक्टर ने उन्हें भी डांट कर बाहर निकाल दिया और एक एक को अंदर आने को कहा। उसका पारा थमने का नाम नहीं ले रहा था और इसी उत्तेजना में वह इंजेक्शन ठोके जा रही थी। लोग डर रहे थे कि डाक्टर गुस्से में इंजेक्शन इधर उधर नहीं लगा दे।

घंटा भर भी नहीं लगा होगा कि मेरा नंबर आ गया, अब तक डाक्टर शांत हो चुकी थी। गुस्सा भले ही उसके नाक पर रहता हो मगर अपने काम में वह प्रवीण थी। इंजेक्शन उसने ऐसे लगाया कि पता भी नहीं चला। कार्ड पर साईन करते हुए उसने सामने के कमरे में बैठे मुख्य चिकित्सा अधिकारी से छाप लगवाने को कहा। अधिकारी महोदय कई काम एक साथ कर रहे थे। वे येलोफीवर के सर्टिफिकेट भी बना रहे थे, अन्य कागजातों पर भी हस्ताक्षर कर रहे थे, फोन पर भी बात कर रहे थे और चाय भी पीते जा रहे थे। उनका मातहत उनके पास ही खड़ा था और फोन पर हाथ रख कर वे उससे भी बतिया रहे थे। उनकी बातों से लगता था कि अधिकारी महोदय भी डाक्टर महिला से सहमे हुए थे।

समय तीन से थोड़ा उपर हो रहा था। सर्टिफिकेट मुझे मिल गया था। अब इसे पासपोर्ट के साथ विदेश मंत्रालय में सौंपना था और हमारा दिल्ली का काम खत्म। इसमें ज्यादा से ज्यादा घंटा भर और लगने की संभावना थी। मैंने संदीप को फोन कर दिया कि सब काम निपटा कर 5 बजे तक मैं एयरपोर्ट पहुंच जाऊंगा. उसी हिसाब से यह टिकट बनवा ले।

अब हमने ओटो पकड़ा और शास्त्री भवन पहुंच गये। यह बहुत बड़ी कई मंजिली इमारत है जिसमें भारत सरकार के कई मंत्रालयों के कार्यालय हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी यहीं है। हमें विदेश मंत्रालय जाना था। इसके लिये नीचे से पर्ची बनवाना जरूरी होता है। पर्ची बनाने वाला उस ऑफिस में फोन करके पूछता है जिस ऑफिस में आप जा रहे हैं. वहां से हामी मिलने के बाद ही यह पर्ची बनाता है।

जिस ऑफिस में हमें जाना था वह पहली मंजिल पर ही है। यहां हमें समाचार पत्रों की सबसे बड़ी संस्था आई. एन. एस. के पूर्व कोषाध्यक्ष सुनील डांग मिल गये जो 'आफ्टर नून नामक पत्रिका निकालते हैं। ये भी हमारे साथ यात्रा पर जा रहे थे। जल्द ही सुरेश बाफना और अन्य भी आ गये। हम सबने अपने अपने पासपोर्ट और बेलो फीवर के सर्टिफिकेट यहाँ जमा करा दिये।

विदेश मंत्रालय के अधिकारी श्री इ. पी. टेकी और श्री धरम पाल ने हमारी खातिरदारी की। टेकी ने बताया कि येलो फीवर का टीका लगवाना इसलिये जरूरी है क्यूंकि नाईजीरिया में इस बीमारी का भय है इसलिये यह अपने हित में ही है। द. अफ्रीका में इसलिये जरूरी है कि कहीं आप यह बीमारी लेकर वहां प्रविष्ठ न हो जाओ और वहां यह बीमारी फैल जाये। बिना इस सर्टिफिकेट के द. अफ्रीका में कोई प्रवेश ही नहीं कर सकता।

Updated On 19 Jan 2026 6:10 PM IST
Suresh Goyal

Suresh Goyal

सुरेश गोयल भारत के प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक और समाजसेवी हैं। वे प्रसिद्ध राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ‘प्रातःकाल’ के प्रधान संपादक हैं और उन चुनिंदा पत्रकारों में शामिल हैं जिन्हें प्रधानमंत्री की राजकीय विदेश यात्राओं में सहभागिता का अवसर मिला है। 24 अगस्त 1944 को उदयपुर के प्रसिद्ध कागजी परिवार में जन्मे सुरेश गोयल को बचपन से ही मुद्रण और पुस्तकों का वातावरण मिला। कला स्नातक गोयल का झुकाव प्रारम्भ से ही पत्रकारिता, लेखन और रंगमंच की ओर रहा। उन्होंने नाट्य लेखन, निर्देशन और अभिनय भी किया है। हिन्दी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार रखने वाले सुरेश गोयल ने यात्रा, इतिहास और पर्यटन विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनका मराठी और गुजराती सहित अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। वे उर्दू भाषा में भी दक्ष हैं और एक सशक्त कथाशिल्पी के रूप में ऐतिहासिक, साहसिक, अपराध और बाल साहित्य में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। 5 सितंबर 1979 को उन्होंने उदयपुर से ‘प्रातःकाल’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ किया, जो बाद में जयपुर, मुंबई, दिल्ली और जोधपुर तक विस्तारित हुआ और राजस्थान व महाराष्ट्र में राज्यस्तरीय मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय अख़बार बना। पत्रकारिता के साथ-साथ सुरेश गोयल सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं और अनेक सामाजिक व शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान और उपाधियाँ प्राप्त हुई हैं।

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