प्रातःकाल के प्रधान संपादक सुरेश गोयल का विशेष यात्रा वृत्तांत: दिल्ली मेट्रो के पहले अनुभव से लेकर कनॉट प्लेस की बदलती तस्वीर तक। इस लेख में पढ़िए कि कैसे दिल्ली की चकाचौंध ने उन्हें मुंबई की बदहाली पर सोचने को मजबूर कर दिया। साथ ही जानिए नाईजीरिया यात्रा से ठीक पहले मिली उन खौफनाक चेतावनियों के बारे में, जिसने 'क्रेडिट कार्ड' और 'सुरक्षा' को लेकर खड़े किए बड़े सवाल। एक दिलचस्प संस्मरण जो आपको हकीकत से रूबरू कराएगा।

अप्यू घर से निकल कर हम प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन में चढ़ गये। यहाँ ऊपर जाने के लिये सीड़ियां भी थी और बड़ी सी लिफ्ट भी हम लिफ्ट लेकर स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुंच गये। यह अत्याधुनिक तथा विश्वस्तरीय प्रतीत हो रहा था। हमने कनाट प्लेस तक का टिकिट लिया तो टिकिट के रूप में टोकन दे दिये गये। रेल में बैठने के लिए आगे बढ़े तो राह में स्वचलित फाटकें थी. यहां भी टोकन अड़ा देने मात्र से फाटक का डंडा खुल जाता था और एक व्यक्ति के प्रवेश करते ही डंडा वापस बंद हो जाता था। प्लेटफार्म पूरा ग्रेनाइट के फर्श का बना था तथा विभिन्न आवश्यक सूचनाएं इलेक्ट्रिक नाम पट्टिकाओं से दर्शाई जा रही थी।


प्लेटफार्म पर अन्य लोगों के साथ हम भी खड़े हो गये। कुछ ही पलों में धड़धड़ाती ट्रेन हमारे सामने आ खड़ी हुई। ट्रेन के दरवाजे अपने आप खुले और इस स्टेशन पर उतरने वाले बाहर निकल गये. इसके बाद ट्रेन में चढ़ने वालों के साथ हम भी चढ़ गये। कुछ क्षणों में ट्रेन के दरवाजे अपने आप बन्द हो गये । ट्रेन चल पड़ी डिब्बे के अन्दर बैठने और खड़े रहने की सुविधा थी। डिब्बे में भी इलेक्ट्रोनिक नाम पट्टिका पर निरन्तर सूचनाएं दर्शाई जा रही थी कि अगला स्टेशन कौन-सा है तथा इसका प्लेटफार्म किधर है, दायें है या बायें। अन्दर बैठे यात्रियों को ट्रेन की आवाज नहीं आती और ऐसा लगता है जैसे ट्रेन पटरियों पर फिसलती जा रही है


इस बीच हमारी ट्रेन कब भूमितल में प्रवेश कर गई यह भी हमें पता नहीं चला। कनाट प्लेस पर उतरे तो बाहर निकलने के लिए स्वचलित सीढ़ियों वाले एस्केलेटर चढ़ने पड़े। मैं अचरज में पड़ गया क्यूंकि जहां से बैठे थे वहां पर नीचे से उपर आये थे। होना तो यह चाहिये था कि हम वापस उपर से नीचे जाते मगर हम उपर से और उपर जा रहे थे । एस्केलेटर चढ़कर एक मंजिल और लिफ्ट से चढ़ना पड़ा तब कहीं जाकर हम बाहर भूमि पर निकले । अब मेरी समझ में आया कि हम दो-तीन मंजिल नीचे भूमितल में यात्रा कर रहे थे। दिल्ली की मेट्रो ट्रेन से मैं बहुत प्रभावित हुआ और एक बार इसकी तुलना मुंबई से करने पर मजबूर हो गया। इस तरह की मेट्रो ट्रेन की यदि किसी महानगर को सबसे पहले जरूरत है तो वह है मुंबई। क्यूंकि मुंबई समुद्र के एक खाड़ी क्षेत्र में बसे होने के कारण इसका भौगोलिक आकार एक पतली पट्टी जैसा है जहां आवागमन हेतु बहुत कम भूमि उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में मेट्रो ट्रेन जैसी भूमिगत व्यवस्था यहां परमावश्यक है। दिल्ली अत्यन्त विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ है वहां ऐसी कोई मजबूरी नहीं है फिर भी यहाँ पहले मेट्रो ट्रेन स्थापित करना और मुंबई को अभी तक योजना की स्थिति में ही लटकाए रखना मुंबई के साथ अन्याय है मैं दिल्ली कई बार आ चुका हू और कनाट प्लेस भी उतनी ही बार मगर कुछ वर्षों में देश ने आर्थिक उदारीकरण के पश्चात जो परिवर्तन अनुभव किये उनको अनुभूति इस बार मुझे कनाट प्लेस पर देखने को मिली। इन वर्षों में कनाट प्लेस और आधुनिक हो गया है तथा विश्व की कई ब्राण्डों के बड़े-बड़े अधिकारिक शोरूम यहाँ एक साथ श्रृंखलाबद्ध देखने को मिले यह नजारा मुंबई में भी एक साथ कहीं भी देखने को नहीं मिलता। यहाँ धूम धाम कर रात को अपने कमरे में आकर हम सो गये।


अगले दिन 13 अक्टूबर को सुबह से ही मेरे फोन की घंटी बजने लगी। सारा • फोन के कारण कभी बात होती कभी नहीं होती। मेरी यात्रा की खबर अखबारों में छप गई। श्री इसलिये जिनके भी पास मेरे फोन नं. थे उनके बधाई के फोन आने लगे। दोपहर तक संदीप भी जयपुर से आ गया था। हम लोगों ने खाना राजस्थान हाउस में ही खाया जो हल्का-फुल्का और स्वादिष्ट था। इस बीच एक परिचित व्यक्ति हमसे मिलने होटल में आ गया। संयोग से वह नाईजीरिया गया हुआ था। उसे जब पता चला कि मैं नाईजीरिया जा रहा हूं तो उसने भी पूर्व में व्यक्त की गई आशंकाओं की पुष्टि की और बताया कि वहाँ हालात बहुत खराब है, छोटी सी रकम के लिए चाकू निकलना या गोली चल जाना मामूली बात है। पैसा बहुत है मगर लोग गरीब हैं।


एक दिन पूर्व ही चक्रवर्ती ने भी सलाह दी थी कि सभी लोग अपने साथ कम से कम डालर रखेंगे तो अच्छा रहेगा क्यूंकि ऐसी स्थिति में कोई अगर लुट भी लिया जाता है तो ज्यादा नुक्सान नहीं होगा। उन्होंने बताया कि वैसे भी वहां शोपिंग करने जैसा कुछ नहीं है। अगर है भी तो बहुत महंगा है, सभी चीजें भारत में उपलब्ध है और वह भी कम दामों पर। इस पर एक पत्रकार ने कहा कि ऐसी स्थिति में तो वहां क्रेडिट कार्ड से खरीददारी करना ही बेहतर रहेगा। चक्रवर्ती ने इस पर कहा क्रेडिट कार्ड तो कोई भूलकर भी इस्तेमाल नहीं करे क्यूंकि नाईजीरिया के चोर आपके क्रेडिट कार्ड से नकली क्रेडिट कार्ड बनाकर और आपका पासवर्ड खोज कर आपके खाते का सारा रूपया हजम करने हेतु जग प्रसिद्ध हैं। मुझे अब लगने लगा कि ऐसे देश की यात्रा करने से क्या फायदा, फिर लगा कि ऐसे ही देश की तो यात्रा करनी चाहिये ताकि पता लगे कि दुनिया में कुछ देश ऐसे भी है। यात्रा की घड़ी नजदीक आ रही थी हमने अपना समय अंतिम तैयारियां करने में लगा दिया और दिन भर राजस्थान हाउस में ही रहे। मेरे खादी के वखों को देख कर हर कोई मुझे कौतुहल की दृष्टि से देखता और जानने की कोशिश करता कि मैं कोई मिनिस्टर हूं या एम.एल.ए.. जब उन्हें हकीकत पता चलती तो वे खींसे निपोर कर अच्छा अच्छा कह देते ।


सुबह साढ़े सात बजे से पहले वायुसेना के हवाई अड्डे पर पहुंचना था, यह स्थान हमारे लिये अनजाना था इसलिए सोचा कि हो सकता है सुबह इसे ढूंढने में थोड़ा वक्त लग जाये इसलिये 6 बजे तक होटल छोड़ देने का हमने तय कर लिया। रिसेप्शन पर पांच बजे हमें जगाने का आग्रह करने के बाद हम सो गये।

Updated On 8 Jan 2026 7:14 PM IST
Suresh Goyal

Suresh Goyal

सुरेश गोयल भारत के प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक और समाजसेवी हैं। वे प्रसिद्ध राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ‘प्रातःकाल’ के प्रधान संपादक हैं और उन चुनिंदा पत्रकारों में शामिल हैं जिन्हें प्रधानमंत्री की राजकीय विदेश यात्राओं में सहभागिता का अवसर मिला है। 24 अगस्त 1944 को उदयपुर के प्रसिद्ध कागजी परिवार में जन्मे सुरेश गोयल को बचपन से ही मुद्रण और पुस्तकों का वातावरण मिला। कला स्नातक गोयल का झुकाव प्रारम्भ से ही पत्रकारिता, लेखन और रंगमंच की ओर रहा। उन्होंने नाट्य लेखन, निर्देशन और अभिनय भी किया है। हिन्दी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार रखने वाले सुरेश गोयल ने यात्रा, इतिहास और पर्यटन विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनका मराठी और गुजराती सहित अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। वे उर्दू भाषा में भी दक्ष हैं और एक सशक्त कथाशिल्पी के रूप में ऐतिहासिक, साहसिक, अपराध और बाल साहित्य में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। 5 सितंबर 1979 को उन्होंने उदयपुर से ‘प्रातःकाल’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ किया, जो बाद में जयपुर, मुंबई, दिल्ली और जोधपुर तक विस्तारित हुआ और राजस्थान व महाराष्ट्र में राज्यस्तरीय मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय अख़बार बना। पत्रकारिता के साथ-साथ सुरेश गोयल सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं और अनेक सामाजिक व शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान और उपाधियाँ प्राप्त हुई हैं।

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