आमेट उपखंड के ग्राम भादला में वार्ड परिसीमन का विरोध तेज हो गया है। सालवी समाज ने वार्ड संख्या 3 को नवीन ग्राम पंचायत भीलमगरा में शामिल करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा है। ग्रामीणों की मांग है कि उनके क्षेत्र को पूर्व की भांति ग्राम पंचायत जिलोला में ही रखा जाए ताकि उनकी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था बाधित न हो। इस महत्वपूर्ण समाचार की पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

आमेट। उपखंड क्षेत्र के ग्राम भादला में वार्ड परिसीमन की नई व्यवस्था को लेकर असंतोष की ज्वाला भड़क उठी है। स्थानीय ग्रामीणों और विशेषकर सालवी समाज ने प्रशासन द्वारा किए गए नए बदलावों को सिरे से नकारते हुए अपनी पारंपरिक और प्रशासनिक पहचान को बचाने के लिए हुंकार भरी है। परिसीमन के इस खेल में दशकों पुराने सामाजिक ताने-बाने के टूटने की आशंका ने अब एक बड़े विरोध का रूप ले लिया है, जिसके चलते ग्रामीणों ने तहसील कार्यालय पहुंचकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

घटनाक्रम के अनुसार, ग्राम भादला के वार्ड संख्या 3 के निवासियों ने तहसीलदार को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर अपनी नाराजगी व्यक्त की है। ग्रामीणों का मुख्य विरोध इस बात पर है कि नए परिसीमन के तहत उनके वार्ड को ग्राम पंचायत जिलोला से पृथक कर नवीन ग्राम पंचायत भीलमगरा में सम्मिलित कर दिया गया है। ज्ञापन में यह तथ्य प्रमुखता से उठाया गया है कि वार्ड संख्या 3 में अधिकांश आबादी सालवी समाज की है, जिसका जुड़ाव आजादी के समय से ही जिलोला राज परिवार और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था से रहा है। सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक रूप से भी यह क्षेत्र पूरी तरह जिलोला पंचायत के साथ रचा-बसा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि इस महत्वपूर्ण भौगोलिक और प्रशासनिक परिवर्तन से पूर्व उन्हें किसी भी प्रकार की सूचना नहीं दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई। सहसा किए गए इस बदलाव से क्षेत्र की सामाजिक संरचना पर गहरा आघात लगने की संभावना है। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि भीलमगरा पंचायत में शामिल होने से उन्हें न केवल प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करना पड़ेगा, बल्कि वर्षों से चली आ रही उनकी सामाजिक निरंतरता भी खंडित हो जाएगी। उनकी एकमात्र मांग है कि क्षेत्र की सुविधा और जनभावनाओं का सम्मान करते हुए वार्ड संख्या 3 सालवी बस्ती को यथावत ग्राम पंचायत जिलोला में ही रखा जाए।

ज्ञापन सौंपने के दौरान सालवी समाज की एकजुटता देखते ही बनती थी। इस अवसर पर रतनलाल, बंसीलाल, भेरूलाल, भूरालाल, बालूराम, भगालाल, गिरधारीलाल, जगदीशचंद्र और रमेश चंद्र सहित समाज के कई प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे। ग्रामीणों की यह मांग अब प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि यह मामला केवल सीमांकन का नहीं बल्कि जनभावना और दशकों पुरानी पहचान को बचाए रखने का है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस विरोध को संज्ञान में लेकर क्या कदम उठाता है।

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