आमेट: राजसी वैभव और गंगा-जमुनी तहजीब का संगम, जब उस्ता परिवार की दहलीज पर पहुंचे रावत साहब
आमेट राजमहल के रावत जयवर्धन सिंह ने तोपची जागीरदार अब्दुल रहमान उस्ता के वर्क्स शॉप पर पहुंचकर ऐतिहासिक यादें ताजा कीं। इस खास मुलाकात में मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास, महाराणा प्रताप और हकीम खां सूरी के बलिदानों पर चर्चा हुई। जानिए कैसे आमेट में राजसी परंपरा और गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने एकता की नई मिसाल पेश की है।

आमेट (राजसमंद)। मेवाड़ की वीर प्रसूता धरा पर आज भी राजसी परंपराओं और आपसी सद्भाव की महक जीवित है। इसी गौरवशाली विरासत का एक अनुपम दृश्य ऐतिहासिक नगर आमेट में उस समय देखने को मिला, जब राजमहल ठिकाना आमेट के रावत साहब ने अपने सहयोगियों के साथ एक जागीरदार परिवार के द्वार पर दस्तक दी। यह अवसर केवल एक शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने मेवाड़ के स्वर्णिम इतिहास और हिंदू-मुस्लिम एकता की उस अटूट डोर को फिर से जीवंत कर दिया, जो सदियों से इस माटी की पहचान रही है।
वीरपत्ता सर्कल पर स्थित स्टार इंजीनियरिंग वर्क्स शॉप उस समय उत्साह और गर्मजोशी से भर उठी, जब ठिकाना आमेट के श्री श्री रावत साहब जयवर्धन सिंह जी वहां पधारे। उनके साथ चुरू ठिकाना के श्रीमान लॉयर विजय सिंह, गोटू बावजी, कोशीथल ठिकाना के श्री बलवंत सिंह (बल्लू बावजी) और आमेट बार एसोसिएशन के ऊर्जावान अध्यक्ष व राजमहल के वकील वीरेंद्र सिंह चूंडावत भी उपस्थित रहे। राजपरिवार और विशिष्ट अतिथियों के आगमन पर ठिकाना आमेट के तोपची जागीरदार, अहले सुन्नत वल जमात के मुस्लिम खलीफा एवं पूर्व अध्यक्ष अब्दुल रहमान उस्ता ने पूरे उत्साह के साथ उनका खैर-मखदम और इस्तकबाल किया।
इस विशेष मिलन के दौरान वहां मौजूद जमात के सरपरस्त और पूर्व अध्यक्ष जहूर हुसैन शोरगर, मोहम्मद इसहाक उस्ता, तुफैल अहमद उस्ता, अय्यूब हुसैन शोरगार, अहमद रजा उस्ता और मोहम्मद हुसैन मंसूरी ने परंपरा के अनुरूप अतिथियों का स्वागत किया। कार्यशाला में करीब एक घंटे तक चले इस आत्मीय संवाद ने पुराने दौर की यादों को ताजा कर दिया। उस्ता वेलफेयर सोसाइटी ट्रस्ट के प्रदेश उपाध्यक्ष तुफैल अहमद उस्ता ने बताया कि इस मुलाकात के दौरान मेवाड़ की शौर्य गाथाओं, विशेषकर महाराणा प्रताप और उनके निष्ठावान सेनापति हकीम खां सूरी के बीच के अटूट विश्वास और बलिदान पर गहन चर्चा हुई।
चर्चा का केंद्र केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि मेवाड़ की विभिन्न रियासतों, रजवाड़ों और वहां के वीर योद्धाओं द्वारा दी गई कुर्बानियां भी रहीं। राजसी ठाठ-बाट और जागीरदारी परंपराओं के बीच हुई इस मुलाकात ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि वक्त भले ही बदल गया हो, लेकिन आमेट के राजमहल और यहां के वफादार जागीरदारों के बीच का सम्मान और स्नेह आज भी अडिग है। यह शिष्टाचार भेंट न केवल दो परिवारों का मिलन थी, बल्कि यह मेवाड़ के गौरवशाली सामाजिक ताने-बाने और साझा सांस्कृतिक विरासत के पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरी है।

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