जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के रंगीलो 2026 मेले में ब्यावर के पशुपालक ने हासिल किया प्रथम स्थान, थारपारकर नस्ल की गाय ने दुग्ध उत्पादन में बनाया रिकॉर्ड।

कृषि विज्ञान केंद्र, रायपुर के मार्गदर्शन में ग्राम आनंदपुर कालू, जैतारण के प्रगतिशील किसान एवं पशुपालक श्री बलवीर कारेसिया (पुत्र श्री बलदेव राम कारेसिया) ने श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर में 27–28 फरवरी 2026 को आयोजित द्विदिवसीय “कृषि एवं पशु मेला रंगीलो 2026” में भाग लेकर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। मेले में आयोजित थारपारकर नस्ल की गायों की दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता में श्री कारेसिया ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान हासिल किया। उनकी इस उपलब्धि से ब्यावर जिले का नाम प्रदेश स्तर पर गौरवान्वित हुआ है। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर उन्हें ₹2,51,000 की सम्मान राशि एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह उपलब्धि क्षेत्र के किसानों और पशुपालकों के लिए प्रेरणास्रोत है।

वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा हर्ष एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना

कृषि विज्ञान केंद्र, रायपुर के अधिकारियों ने इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए श्री बलवीर करेसिया के उज्ज्वल भविष्य की कामना की है तथा इसे क्षेत्र में उन्नत पशुपालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. एम. एस. चांदावत ने श्री बलवीर करेशिया को शुभकामना प्रेषित की तथा "क्षेत्र के अन्य किसानों को भी उन्नत पशुपालन से नए आयाम स्थापित करने के लिए अपील की"। इसके साथ ही केंद्र के पशुपालक विशेषज्ञ डॉ. नितेश शर्मा ने बताया कि "बलवीर जी की इस उपलब्धि से क्षेत्र के किसानों को प्रेरणा मिलेगी, इसके साथ ही क्षेत्र में गौ संरक्षण एवं संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा"।

थारपारकर नस्ल की विशेषताएँ एवं अनुकूलता

केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. शर्मा ने इस गाय की विशेषता के बारे में बताया कि यह गाय की नस्ल ब्यावर जिले की जलवायु की परिस्थितियों के लिए अनुकूल है। थारपारकर गाय भारत की प्रसिद्ध दुग्ध नस्ल है, जो मुख्य रूप से राजस्थान के शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका उत्पत्ति क्षेत्र मुख्यतः राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र (जैसलमेर, बाड़मेर) है और इसमें गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी अनुकूलता है। इसकी शारीरिक बनावट में रंग हल्का सफेद से चांदी जैसा ग्रे, शरीर मध्यम से बड़ा और मजबूत, सींग मध्यम आकार के और हल्के मुड़े हुए तथा कूबड़ (हंप) अच्छी तरह विकसित होता है।

इसकी दुग्ध उत्पादन क्षमता औसतन 8–12 लीटर प्रतिदिन है, जो अच्छी देखभाल में 15 लीटर तक पहुँच जाती है। एक दुग्धकाल में यह लगभग 2000–3000 लीटर दूध देती है और दूध में वसा प्रतिशत लगभग 4–5% होता है। थारपारकर में जलवायु सहनशीलता अत्यधिक है, जिसमें 45°C से अधिक गर्मी सहन करने की क्षमता, कम चारे और पानी में भी जीवित रहने की क्षमता तथा अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता शामिल है। यह दोहरे उद्देश्य वाली नस्ल है, जिसके बैल खेती कार्य के लिए मजबूत तथा सूखा और कठोर परिस्थितियों में उपयोगी होते हैं। इसकी प्रजनन विशेषताओं में पहली बार बछड़ा देने की आयु लगभग 3–3.5 वर्ष है और बछड़ों की जीवित रहने की दर अच्छी है।

वैज्ञानिक प्रशिक्षण एवं सरकारी योजनाओं का लाभ

केंद्र की विशेषज्ञ डॉ. निधि ने बताया कि "कृषि विज्ञान केंद्र रायपुर में गाय एवं भैंस पालन के द्वारा उधमिता विकास विषय पर सात दिवसीय संस्थागत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होते हैं, इस प्रशिक्षण का फायदा लेकर किसान भाई वैज्ञानिक सोच के साथ उन्नत पशुपालन कर सकते हैं तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद केंद्र एवं राज्य सरकार की योजना का लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं"।

Pratahkal Newsroom

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