प्रतापगढ़ के ग्रामीण अंचलों में चांग की थाप पर रंग-गुलाल उड़ा, वहीं शहर में ऐतिहासिक शोक की परंपरा के चलते तेरस को मनाया जाएगा होली का उत्सव।

होलिका दहन के तीसरे दिन पूरे प्रतापगढ़ जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में रंग–गुलाल की ऐसी बयार चली कि गलियों से लेकर खुले मैदानों तक युवा, बुजुर्ग और महिलाओं का उत्साह देखने लायक रहा। ग्रामीण क्षेत्र में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवतियां जमकर होली खेलती हुई नजर आई। सुबह से ही लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हुए त्योहारी उमंग में डूबे नजर आए।

फागुनी गीतों और चांग की थाप पर थिरके ग्रामीण

चांग और डफली की पारंपरिक धुनों पर लोग थिरकते रहे और बच्चों में भी रंगों को लेकर खासा उत्साह दिखा। ग्रामीण इलाकों में घर-घर से गुलाल उड़ने लगा और माहौल पूरी तरह फागुन के रंग में रंग गया। होली के पारंपरिक गीतों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती रही, जिससे पूरे क्षेत्र में त्योहार की रौनक और भी बढ़ गई।

जिला मुख्यालय में शोक की परंपरा और शांति का माहौल

वहीं जिले के मुख्यालय प्रतापगढ़ में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार इस दिन होली नहीं खेली जाती। बताया जाता है कि "किसी ऐतिहासिक घटना के चलते यहां शोक पालन का नियम बना, जो आज भी कायम है।" इसलिए जब पूरे जिले में रंगों की धूम मची रही, मुख्यालय में शांति का माहौल देखा गया। दुकानों, गलियों और चौक-चौराहों पर सामान्य गतिविधियाँ तो रहीं, लेकिन रंग खेलने की पूरी तरह मनाही रही।

तेरस पर मनेगी मुख्यालय की विशेष होली

यहां होली का उत्सव तेरस को मनाया जाता है, जब लोग धूमधाम से रंगों में सराबोर होकर त्योहार का आनंद लेते हैं। तेरस के दिन मुख्यालय की सड़कों पर भी उतना ही जोश होता है जितना ग्रामीण इलाकों में तीसरे दिन की होली में दिखाई दिखाई देता है। यही परंपरा प्रतापगढ़ को अलग पहचान देती है।

Pratahkal Bureau

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