आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अगस्त 2025 में इस्लाम और भारतीयता पर दिए गए बयान का वीडियो फिर सामने आने से नई बहस छिड़ गई है। बयान को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, जो राष्ट्रवादी विमर्श में गहरे मतभेदों और सामाजिक समरसता के सवालों को उजागर करती हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के अगस्त 2025 में दिए गए एक व्याख्यान का वीडियो क्लिप एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। इस पुराने बयान के दोबारा प्रसारित होने के साथ ही राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब भागवत ने 3 जनवरी 2026 को भोपाल में एक अलग संदर्भ में सामाजिक समरसता और पारिवारिक संवाद पर जोर दिया था।

अगस्त 2025 में नई दिल्ली में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान मोहन भागवत ने कहा था कि इस्लाम भारत में तब से मौजूद है जब से वह यहां आया और भविष्य में भी रहेगा। उन्होंने यह भी टिप्पणी की थी कि जो हिंदू इस्लाम के अस्तित्व को समाप्त करने की इच्छा रखते हैं, वे हिंदू मानसिकता को सही अर्थों में नहीं समझते। उनके अनुसार, भारत की सभ्यता और समाज बहुलतावादी रहा है, जहां विभिन्न धार्मिक परंपराओं ने साथ-साथ सहअस्तित्व में विकास किया है।

इसी व्याख्यान में भागवत ने मुसलमानों और ईसाइयों से भी अपील की थी कि वे अपनी “भारतीय” या “भारतीयता” की जड़ों को स्वीकार करें, ताकि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सौहार्द को मजबूती मिल सके। उन्होंने यह तर्क रखा कि धार्मिक पहचान से पहले सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को प्राथमिकता देना देश के दीर्घकालिक हित में है। इसके अलावा, उन्होंने जनसंख्या संतुलन का मुद्दा उठाते हुए परिवारों से तीन बच्चों का सुझाव भी दिया था, जिसे उन्होंने सामाजिक संतुलन के नजरिए से महत्वपूर्ण बताया।

हाल के दिनों में इस वीडियो क्लिप के दोबारा सामने आने से प्रतिक्रियाओं का एक नया दौर शुरू हो गया है। कुछ हिंदू संगठनों और समर्थकों ने भागवत के विचारों को “पुराने दौर की सोच” बताते हुए आलोचना की है, जबकि अन्य वर्गों ने इसे व्यावहारिक और समावेशी दृष्टिकोण करार दिया है। वहीं, मुस्लिम समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बयान को सहअस्तित्व और संवाद की दिशा में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा है। इस पूरे घटनाक्रम ने राष्ट्रवादी विचारधारा के भीतर मौजूद मतभेदों और वैचारिक विभाजनों को भी उजागर किया है।

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है, जब मोहन भागवत ने 3 जनवरी 2026 को भोपाल में दिए गए अपने भाषण में अंतरधार्मिक संबंधों और सामाजिक मुद्दों पर परिवारों के भीतर संवाद को प्राथमिक समाधान बताया था। उन्होंने कहा था कि संवेदनशील विषयों को टकराव या सार्वजनिक विवाद के बजाय आपसी बातचीत और समझ के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। हालांकि उस भाषण का संदर्भ अलग था, लेकिन अगस्त 2025 के बयान के पुनः प्रसार ने दोनों घटनाओं को जोड़ते हुए व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह प्रकरण केवल एक पुराने बयान की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में पहचान, सहअस्तित्व और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर चल रही बहस को भी दर्शाता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस चर्चा का प्रभाव सार्वजनिक संवाद, राजनीतिक रुख और सामाजिक संबंधों पर किस दिशा में पड़ता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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