पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने चाबहार पोर्ट, रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता पर क्या कहा? पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

आज 1 मार्च, 2026 को दुनिया भर में भू-राजनीतिक (geopolitical) समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया पर टिकी हैं। ऐसे में भारत के लिए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को बचाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

हाल ही में 'News18 राइजिंग भारत समिट' में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया, जिसने स्पष्ट कर दिया है कि भारत इन चुनौतियों के बीच अपने हितों की रक्षा कैसे करेगा।

चाबहार पोर्ट: भारत के लिए क्यों है अहम?

रक्षा सचिव ने साफ किया कि भारत ईरान स्थित चाबहार पोर्ट में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक बातचीत (negotiation) का रास्ता अपनाएगा।

भारत के लिए चाबहार पोर्ट केवल एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि यह मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का 'गेटवे' है। पाकिस्तान के रास्ते जाने के बजाय, चाबहार भारत को सीधे समुद्र के रास्ते इन देशों से जोड़ता है, जिससे व्यापार और सामरिक पहुंच (strategic access) मजबूत होती है। मौजूदा तनावों के बीच, भारत का लक्ष्य यह है कि वहां का संचालन बाधित न हो और व्यापार सुचारू रूप से चलता रहे।

'एक नखलिस्तान (Oasis) की तरह है भारत'

रक्षा सचिव ने मौजूदा वैश्विक स्थिति पर बात करते हुए कहा कि आज की दुनिया संघर्षों से घिरी हुई है, लेकिन भारत इस मामले में काफी हद तक 'सुरक्षित' या 'नखलिस्तान' (Oasis) जैसा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहे हैं। उन्होंने कहा:

"हम दुनिया के उन हिस्सों में से हैं जो भू-राजनीतिक संघर्षों के बावजूद अभी भी एक शांत नखलिस्तान की तरह हैं। लेकिन हमें अपनी कूटनीति और रक्षा तैयारियों को लेकर हमेशा सतर्क रहना होगा।"

रक्षा तैयारी और भविष्य की रणनीति

हालिया संघर्षों (जैसे 'ऑपरेशन सिंदूर') से भारत ने कई महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं। रक्षा सचिव के अनुसार, आधुनिक युद्ध अब केवल जमीन पर नहीं लड़े जाते। अब महत्व बढ़ गया है:

  • वायु शक्ति (Air Power)
  • स्टैंड-ऑफ हथियार (Stand-off weapons)
  • ड्रोन और मानवरहित प्रणाली (Unmanned systems)

सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए वित्त वर्ष 2027 के लिए आधुनिकीकरण बजट में 24 प्रतिशत की भारी वृद्धि की है। साथ ही, घरेलू रक्षा उद्योगों को मजबूती देने के लिए ₹2.9 लाख करोड़ के रक्षा अनुबंध (contracts) साइन किए गए हैं, जो भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत है।

आत्मनिर्भरता और 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी'

अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकियों का भारत-रूस संबंधों पर क्या असर पड़ेगा? रक्षा सचिव ने इसे बड़ी स्पष्टता के साथ खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) का मतलब है कि भारत अपने हितों के अनुसार रूस, फ्रांस और अमेरिका—तीनों के साथ अलग-अलग संबंध निभा सकता है।

  • रूस का महत्व: आज भी भारत के कुल रक्षा आयात का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा रूस से आता है।
  • घरेलू निर्माण: भारत अब 'मेक इन इंडिया' पर जोर दे रहा है। लक्ष्य है कि भारत के कुल रक्षा खर्च का 75% हिस्सा देश के भीतर ही खर्च हो।
  • राफेल और भविष्य: राफेल जेट्स का घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ाने और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट, 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (AMCA) को भविष्य की वायु सेना की रीढ़ बनाने की योजना है।

इजरायल के साथ सहयोग

तनाव के बावजूद, भारत इजरायल के साथ औद्योगिक सहयोग और को-प्रोडक्शन (संयुक्त उत्पादन) जारी रखेगा। विशेष रूप से एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक तकनीकों में दोनों देशों की भागीदारी बढ़ेगी।


भारत का रुख बहुत ही संतुलित है। जहाँ एक ओर दुनिया युद्ध की आंच में झुलस रही है, भारत 'बातचीत' के जरिए अपने व्यापारिक और रक्षा हितों को बचाने की कोशिश कर रहा है। रक्षा सचिव के ये बयान यह भरोसा दिलाते हैं कि सरकार भविष्य की चुनौतियों के प्रति न केवल जागरूक है, बल्कि उन्हें संभालने के लिए आर्थिक और सैन्य तौर पर भी तैयार है।

आने वाले समय में, भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र यही होगा: दुनिया के साथ जुड़ना, लेकिन अपने हितों से समझौता न करना।

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