कौन थीं सावित्रीबाई फुले? जानिए कैसे समाज से लड़कर 'पहली महिला टीचर' ने बदली पूरे भारत की तकदीर?
भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती पर विशेष लेख। जानें कैसे 1848 में उन्होंने पुणे में पहला बालिका विद्यालय खोलकर क्रांति की शुरुआत की। कीचड़ और पत्थरों की मार सहकर भी उन्होंने महिला शिक्षा और दलितों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है। 3 जनवरी की ऐतिहासिक महत्ता और उनके सामाजिक सुधारों का पूरा विवरण।

भारत के स्वर्णिम इतिहास में कुछ नाम ऐसे दर्ज हैं, जिन्होंने समाज की बंदिशों को तोड़कर न केवल नया रास्ता बनाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उजाले का प्रबंध भी किया। आज 3 जनवरी का दिन ऐसे ही एक व्यक्तित्व को समर्पित है, जिन्होंने पत्थर खाकर भी शिक्षा के बीज बोए। हम बात कर रहे हैं भारत की पहली महिला शिक्षिका, प्रखर समाज सुधारक और महान कवयित्री सावित्रीबाई फुले की। आज उनकी जयंती के अवसर पर देश उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, जिन्होंने उस दौर में नारी सशक्तिकरण का शंखनाद किया था, जब समाज रूढ़ियों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था। महज़ 9 साल की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से हो गया, जो खुद एक महान विचारक और समाज सुधारक थे। सावित्रीबाई की शिक्षा और उनके क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत यहीं से हुई। उन्होंने अपने पति से शिक्षा ग्रहण की और फिर समाज के शोषित वर्गों, विशेषकर महिलाओं और दलितों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। यह वह समय था जब महिलाओं का शिक्षा प्राप्त करना किसी अपराध से कम नहीं माना जाता था, लेकिन सावित्रीबाई के इरादे हिमालय की तरह अडिग थे।
इतिहास के पन्नों में साल 1848 का साल सुनहरे अक्षरों में दर्ज है, जब सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए देश का पहला स्कूल खोला। यह समाज के ठेकेदारों के लिए एक बड़ी चुनौती थी। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो कट्टरपंथी उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंकते थे। अपमान और संघर्ष की उस पराकाष्ठा के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी। वह अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर गंदी साड़ी बदलकर छात्राओं को पढ़ा सकें। उनकी यही जिजीविषा आज करोड़ों भारतीय महिलाओं की शिक्षा का आधार बनी है।
सावित्रीबाई फुले का योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' के माध्यम से सामाजिक समानता और न्याय के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोला और विधवा पुनर्विवाह का पुरजोर समर्थन किया। उनके मानवीय दृष्टिकोण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने छुआछूत जैसी सामाजिक बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए अपने घर के पानी का हौद अछूतों के लिए खोल दिया था।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
