यूनेस्को ने मई 2024 में गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस की ऐतिहासिक पांडुलिपियों को 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड' रजिस्टर में शामिल कर वाराणसी का मान बढ़ाया है। इसमें तुलसीदास की मूल रचना और 18वीं सदी का अरबी अनुवाद शामिल है। राजापुर और वाराणसी के तुलसी घाट से जुड़ी इन अमूल्य विरासतों की गौरवगाथा और उनके वैश्विक महत्व को विस्तार से जानने के लिए पढ़ें यह विशेष रिपोर्ट।

वाराणसी। सदियों से भारतीय जनमानस के हृदय में रची-बसी और गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी से निकली अमर कृति 'रामचरितमानस' ने अब अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नई ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। मई 2024 में मंगोलिया में आयोजित 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर' (MOWCAP) की 10वीं बैठक के दौरान इस महाकाव्य की सचित्र पांडुलिपियों को यूनेस्को के प्रतिष्ठित क्षेत्रीय रजिस्टर में सम्मिलित किया गया है। यह क्षण न केवल सनातन संस्कृति के लिए गौरवपूर्ण है, बल्कि यह गोस्वामी तुलसीदास की कालजयी रचना की सार्वभौमिक स्वीकार्यता को भी रेखांकित करता है।

इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की गहराई उस समय और भी बढ़ जाती है जब हम इस नामांकन के लिए भेजी गई दो विशिष्ट पांडुलिपियों के स्वरूप को देखते हैं। इसमें एक पांडुलिपि स्वयं 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है, जो उनके मौलिक लेखन और दर्शन का जीवंत साक्ष्य प्रस्तुत करती है। वहीं, दूसरी पांडुलिपि 18वीं शताब्दी के दौरान किए गए इसके अरबी अनुवाद की है, जो इस बात का सशक्त प्रमाण है कि रामकथा की गूंज और मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आदर्श चरित्र सीमाओं और भाषाओं के बंधनों को तोड़कर वैश्विक स्तर पर अपनी पैठ बना चुका है।

इन अमूल्य विरासतों के संरक्षण और इतिहास की यात्रा भी अत्यंत रोचक और मार्मिक रही है। गोस्वामी तुलसीदास के जन्मस्थान राजापुर स्थित रामचरित मानस मंदिर में आज भी उनके द्वारा हस्तलिखित मूल पृष्ठों को अत्यंत श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखा गया है। इसके अतिरिक्त, वाराणसी के प्रसिद्ध तुलसी घाट स्थित हनुमान मंदिर में भी वर्ष 1647 की एक पूर्ण प्रति मौजूद रही है, जो शोधकर्ताओं और भक्तों के लिए आस्था का केंद्र रही है। हालांकि, इस ऐतिहासिक धरोहर के साथ एक दुखद अध्याय भी जुड़ा है, जब वर्ष 2011 में इस अनमोल प्रति को चोरी कर लिया गया था, जिससे इस सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर आधिकारिक चिंता उत्पन्न हुई थी।

यूनेस्को द्वारा दिया गया यह सम्मान केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस अटूट भाषाई और आध्यात्मिक सेतु को मान्यता प्रदान करता है जिसे तुलसीदास ने अवधी भाषा के माध्यम से खड़ा किया था। अरबी अनुवाद का इस रजिस्टर में शामिल होना इस महाकाव्य की समावेशी प्रकृति को दर्शाता है। अंततः, रामचरितमानस का यह अंतरराष्ट्रीय पंजीकरण भारतीय साहित्य की उस शक्ति का उद्घोष है, जो युगों-युगों तक मानवता को नैतिकता और धर्म का मार्ग दिखाती रहेगी। यह वैश्विक स्वीकृति भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस सांस्कृतिक निधि को सहेजने की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होगी।

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