सुप्रीम कोर्ट ने 4 जनवरी 2026 के अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि SC, ST, OBC और EWS के उम्मीदवार यदि सामान्य श्रेणी से अधिक अंक लाते हैं, तो वे मेरिट के आधार पर सामान्य सीटों के हकदार होंगे। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता की जीत बताया है।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर देश भर में चर्चा का केंद्र बन गया है, और वजह है सुप्रीम कोर्ट का 4 जनवरी, 2026 को आया एक बड़ा और अहम फैसला। जहाँ एक तरफ इसे 'योग्यता' (Merit) की जीत बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सामान्य वर्ग (General Category) के उम्मीदवारों के बीच इस फैसले को लेकर चिंता और नाराजगी की लहर है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सामान्य सीटें (General Seats) अब केवल सामान्य वर्ग के लिए सुरक्षित नहीं हैं, बल्कि आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र भी इन पर अपना दावा ठोक सकते हैं।

क्या है पूरा मामला जिसने बढ़ाई सामान्य वर्ग की धड़कनें?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जो 2022 की क्लर्क भर्ती (2,756 पद) से जुड़ा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आरक्षित वर्ग (SC, ST, OBC या EWS) का उम्मीदवार सामान्य श्रेणी के 'कट-ऑफ' (Cut-off) से ज्यादा अंक लाता है, तो उसे आरक्षित कोटे में नहीं गिना जाएगा। उसे सीधे तौर पर 'सामान्य सीट' (Open Category Seat) दी जाएगी।

इसका सीधा मतलब यह है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार के पास अब नौकरी पाने के दो रास्ते हैं:

  • अपनी योग्यता के दम पर 'सामान्य सीट' हासिल करना।

  • कम अंक होने पर अपने 'आरक्षित कोटे' का लाभ उठाना।

सामान्य जनता में क्यों है आक्रोश?

इस फैसले के बाद सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को यह डर सता रहा है कि उनके लिए अवसरों का दायरा और सिकुड़ गया है। सामान्य वर्ग के अभ्यार्थियों का तर्क है कि सरकारी नौकरियों में पहले ही 50% से अधिक सीटें आरक्षित हैं। अब बची-खुची 'अनारक्षित' (Unreserved) सीटों पर भी यदि आरक्षित वर्ग के टॉपर्स (Toppers) कब्जा जमा लेंगे, तो सामान्य वर्ग के औसत दर्जे के छात्रों के लिए सरकारी नौकरी का सपना देखना लगभग असंभव हो जाएगा।

सोशल मीडिया और छात्र संगठनों में यह चर्चा तेज है कि 'अनारक्षित' का मतलब अब वास्तव में 'ओपन फॉर ऑल' (Open for All) हो गया है, जहाँ सामान्य वर्ग को न केवल अपने वर्ग से, बल्कि आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों से भी कड़ी टक्कर लेनी होगी।

कानूनी तर्क: मेरिट को नहीं रोक सकते

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 1992 के इंदिरा साहनी जजमेंट का हवाला देते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की व्याख्या की। कोर्ट का कहना है कि आरक्षण का मकसद पिछड़ेपन को दूर करना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम किसी की 'मेरिट' को सजा दें। यदि कोई छात्र आरक्षित वर्ग से आता है लेकिन उसने सामान्य वर्ग के टॉपर से भी बेहतर अंक हासिल किए हैं, तो उसे सामान्य सीट से वंचित करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।


यह फैसला भविष्य की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक नजीर बन गया है। जहाँ न्यायपालिका ने इसे 'समानता' और 'योग्यता' के संतुलन के रूप में पेश किया है, वहीं जमीन पर हकीकत यह है कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा अब पहले से कहीं ज्यादा भीषण हो गई है। अब लड़ाई सिर्फ कट-ऑफ पार करने की नहीं, बल्कि टॉप करने की होगी।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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