मध्यप्रदेश में फिर छाया जानलेवा कहर ; सबसे साफ़ शहर इंदौर का पानी बना साँसों का दुश्मन
इंदौर के भगीरथपुरा इलाके में दूषित नल का पानी पीने से कम से कम 10 लोगों की मौत और सैकड़ों के बीमार होने से हड़कंप मच गया। ई. कोलाई संक्रमण, पुरानी पाइपलाइन, प्रशासनिक लापरवाही और स्वच्छ शहर के दावों पर उठते सवाल इस गंभीर जल संकट को उजागर करते हैं।

इंदौर जल संकट
मध्य प्रदेश का इंदौर, जिसे वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता रहा है, वर्ष के अंत में एक भयावह जल संकट का गवाह बना। शहर के भगीरथपुरा इलाके में नल का पानी पीने से कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। यह घटना न केवल नगर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि “स्वच्छता” के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के खतरनाक अंतर को भी उजागर करती है।
घटना की शुरुआत 29 दिसंबर के आसपास हुई, जब भगीरथपुरा क्षेत्र के निवासियों में अचानक उल्टी, दस्त, तेज बुखार और पेट दर्द की शिकायतें सामने आने लगीं। देखते ही देखते स्थानीय अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। जांच में सामने आया कि इलाके में सप्लाई किया जा रहा नल का पानी ई. कोलाई बैक्टीरिया से दूषित था। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, यह संक्रमण करीब 30 साल पुरानी और जर्जर जल पाइपलाइनों में लीकेज के कारण सीवेज के पानी के मिल जाने से फैला।
मृतकों में बुजुर्ग, महिलाएं और कमजोर स्वास्थ्य वाले लोग शामिल थे, जिनकी हालत तेजी से बिगड़ती गई। कई मरीजों की मौत अत्यधिक डिहाइड्रेशन और अंगों के काम करना बंद कर देने के कारण हुई। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अब तक 9,400 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। 5 जनवरी तक भी 142 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती थे, जिनमें से कई की स्थिति नाजुक बताई गई।
घटना के सामने आते ही प्रशासन ने प्रभावित इलाके में जल आपूर्ति बंद कर दी और वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर टैंकरों के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया गया। नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमें घर-घर जाकर जांच और दवाइयों का वितरण करती रहीं। साथ ही, पानी के सैंपल लेकर प्रयोगशाला जांच कराई गई, जिसमें दूषण की पुष्टि हुई।
इस संकट ने इसलिए भी तूल पकड़ा क्योंकि इंदौर लगातार स्वच्छ सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान हासिल करता रहा है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि पानी की गुणवत्ता को लेकर पहले भी शिकायतें की गई थीं, लेकिन उन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई। इस लापरवाही ने एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया।
राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कुछ नगर निगम अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को निलंबित किया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने और सभी पीड़ितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने की घोषणा की। उन्होंने पूरे मामले की विस्तृत जांच के निर्देश भी दिए।
कानूनी स्तर पर भी हलचल तेज हो गई। न्यायालयों में जनहित याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें पानी की गुणवत्ता, पाइपलाइन रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए गए। विपक्षी दलों ने इसे शासन की विफलता करार देते हुए निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। इस बीच, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी रहा।
इंदौर की यह घटना केवल एक स्थानीय त्रासदी नहीं, बल्कि शहरी बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। स्वच्छता के तमगों और रैंकिंग से परे, सुरक्षित पानी जैसी मूलभूत जरूरत की अनदेखी किस तरह जानलेवा साबित हो सकती है, यह संकट उसी की भयावह मिसाल बन गया है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
