भारत में रोजगार बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ डिग्री की तुलना में स्किल्स को प्राथमिकता दी जा रही है। कंपनियों की भर्ती नीति, गिग इकॉनमी और स्किल-आधारित ट्रेनिंग ने करियर की दिशा बदल दी है। यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे स्किल्स नया रोजगार मानक बन रही हैं।

भारत के युवाओं के सामने आज एक बड़ा और सीधा सवाल खड़ा है—क्या अच्छी नौकरी के लिए अब भी डिग्री ज़रूरी है, या स्किल्स ही नया पासपोर्ट बन चुकी हैं? बदलते दौर की यह बहस अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि कॉरपोरेट बोर्डरूम, स्टार्टअप हब और सरकारी नीतियों तक पहुँच चुकी है। हालिया रुझान साफ़ संकेत दे रहे हैं कि नौकरी का बाज़ार एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

भर्ती का नया ट्रेंड: सर्टिफिकेट नहीं, क्षमता की परीक्षा

पिछले कुछ महीनों में कई बड़ी टेक और कॉर्पोरेट कंपनियों ने भर्ती प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। अब रिज़्यूमे में डिग्री से पहले प्रोजेक्ट्स, पोर्टफोलियो और प्रैक्टिकल अनुभव देखे जा रहे हैं। आईटी, डिजिटल मार्केटिंग, डेटा एनालिटिक्स और एआई जैसे सेक्टर्स में स्किल-आधारित हायरिंग तेज़ी से बढ़ी है। एचआर विशेषज्ञों का कहना है कि “डिग्री उम्मीदवार को इंटरव्यू तक ला सकती है, लेकिन स्किल ही उसे नौकरी दिलाती है।”

क्यों टूट रही है डिग्री की पुरानी पकड़?

विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक शिक्षा प्रणाली इंडस्ट्री की रफ्तार से पीछे छूट रही है। चार साल का कोर्स पूरा होते-होते टेक्नोलॉजी बदल जाती है। वहीं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, शॉर्ट-टर्म कोर्स और बूटकैंप युवाओं को जॉब-रेडी स्किल्स सिखा रहे हैं। यही वजह है कि कंपनियाँ अब “सीखने की क्षमता” को सबसे बड़ी योग्यता मान रही हैं।

गिग इकॉनमी और फ्रीलांस कल्चर ने बदली तस्वीर

फ्रीलांसिंग और गिग इकॉनमी ने इस ट्रेंड को और मज़बूती दी है। आज हज़ारों युवा बिना किसी नामी कॉलेज की डिग्री के, सिर्फ अपने कौशल के दम पर विदेशी क्लाइंट्स से कमाई कर रहे हैं। कंटेंट क्रिएशन, ग्राफिक डिज़ाइन, वीडियो एडिटिंग और ऐप डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में डिग्री नहीं, काम बोलता है।

युवाओं की सोच में बदलाव

दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव सिर्फ कंपनियों में नहीं, युवाओं की सोच में भी दिख रहा है। अब छात्र सवाल पूछ रहे हैं—“क्या चार साल की डिग्री से बेहतर दो साल की स्किल ट्रेनिंग नहीं?” कई युवा कॉलेज के साथ-साथ ऑनलाइन स्किल्स सीख रहे हैं ताकि डिग्री के साथ हुनर भी हाथ में रहे। यह ट्रेंड साफ़ दिखाता है कि नई पीढ़ी जोखिम लेने और वैकल्पिक रास्ते अपनाने से नहीं डर रही।

क्या डिग्री पूरी तरह बेकार हो गई है?

इस सवाल का जवाब इतना सरल नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिग्री की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। मेडिकल, लॉ और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में डिग्री अब भी अनिवार्य है। लेकिन सामान्य कॉर्पोरेट नौकरियों में डिग्री अब एक शर्त नहीं, एक विकल्प बनती जा रही है। यानी डिग्री हो तो बेहतर, लेकिन स्किल हो तो ज़रूरी।

सरकार और शिक्षा नीति पर भी असर

इस बदलते ट्रेंड का असर नीतिगत स्तर पर भी दिख रहा है। स्किल इंडिया, अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम और उद्योग-आधारित ट्रेनिंग पर ज़ोर दिया जा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में कॉलेजों को अपने पाठ्यक्रमों को इंडस्ट्री से जोड़ना ही होगा, वरना वे अप्रासंगिक हो जाएँगे।


तो क्या डिग्री का ज़माना खत्म हो रहा है? शायद नहीं। लेकिन इतना तय है कि डिग्री अकेले अब सफलता की गारंटी नहीं रही। आज के भारत में करियर की असली कुंजी है—लगातार सीखने की क्षमता और काम करके दिखाने का हुनर। सवाल अब यही है—आपके पास डिग्री है, लेकिन क्या आपके पास स्किल भी है?

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