चंद्रपुर के कोरपना में शिक्षक शत्रुघ्न सीताराम दुसराम ने अपने पिता का जन्मदिन फिजूलखर्ची त्याग कर खेत में वृक्षारोपण के साथ मनाया। पर्यावरण संरक्षण और माता-पिता के प्रति सम्मान की यह अनूठी पहल समाज को संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारी का एक सशक्त संदेश दे रही है। जानिए कैसे एक छोटे से प्रयास ने बदली जन्मदिन मनाने की परिभाषा।

आज की भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में जहाँ अक्सर माता-पिता के त्याग और समर्पण को हाशिए पर धकेल दिया जाता है, वहीं महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से एक ऐसी हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायक खबर सामने आई है जो रिश्तों की गहराई और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध कराती है। कोरपना तहसील के अंतर्गत आने वाले एक समर्पित शिक्षक, शत्रुघ्न सीताराम दुसराम ने अपने पिता सीताराम दुसराम के जन्मदिन को किसी महंगे होटल या दिखावे के बजाय प्रकृति की गोद में, अपने ही खेत में मनाकर समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की है। यह आयोजन न केवल एक पारिवारिक उत्सव था, बल्कि इसमें संस्कारों और पर्यावरण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का अद्भुत संगम देखने को मिला।

इस विशेष अवसर पर फिजूलखर्ची और शोर-शराबे से दूर रहते हुए शत्रुघ्न दुसराम ने अपने पिता के दीर्घायु होने की कामना के साथ वृक्षारोपण का संकल्प लिया। बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों के बीच, उन्होंने उपस्थित जनसमूह को यह संदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के विशेष अवसरों पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए और उसका पालन-पोषण करना चाहिए। भावुक होते हुए शत्रुघ्न ने कहा कि आज वे समाज में जिस मुकाम पर हैं और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पहचाने जाते हैं, उसके पीछे उनके पिता द्वारा दिए गए संस्कार, कठिन परिश्रम की सीख और ईमानदार जीवन मूल्यों की सबसे बड़ी भूमिका है।

खेत की मेड़ों पर आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में परिवार के बुजुर्ग सदस्य, सगे-संबंधी, मित्रगण और क्षेत्र के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी आगंतुकों ने सीताराम दुसराम को उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया। इस दौरान उपस्थित लोगों ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि माता-पिता ही बच्चों के पहले गुरु होते हैं और उनका सम्मान करना ही हमारी वास्तविक संस्कृति है। परिवार के सदस्यों का मानना है कि जन्मदिन जैसे अवसरों को केवल खर्च के माध्यम से नहीं, बल्कि समाज को कुछ सार्थक योगदान देकर मनाना चाहिए।

यह आयोजन ग्रामीण संस्कृति, प्रकृति प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का एक सुंदर प्रतिबिंब बनकर उभरा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पिता के जीवन संघर्ष से मिली शिक्षाओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना और युवाओं को माता-पिता के प्रति उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना था। उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे नवाचार समाज में सकारात्मक परिवर्तन की लहर ला सकते हैं। आज यह कार्यक्रम केवल एक परिवार तक सीमित न रहकर पूरे चंद्रपुर क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है, जो हमें सिखाता है कि सामाजिक जुड़ाव और पर्यावरण की रक्षा ही आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा उपहार है।

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