आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर शिक्षित युवक, विवाह को लेकर असमंजस और डर में क्यों हैं? झूठी शिकायतों, कानून के दुरुपयोग और पारिवारिक कलह के बढ़ते मामलों ने विवाह संस्था पर कैसे प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं, इस पर एक विचारोत्तेजक लेख। जानें कैसे संवाद का अभाव और बदलती मानसिकता रिश्तों को प्रभावित कर रही है।

‘मैडम, हमारे घर पर मेरे लिए लड़कियां देखने जा रहे हैं, लेकिन मैं थोड़ा कन्फ्यूजन में हूं।’ 26-27 वर्ष के एक सुशिक्षित युवक द्वारा बोला गया यह वाक्य आज केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लड़कों के मन की भावना या कहें कि डर का प्रतीक बन गया है। अब तक विवाह दो परिवारों को जोड़ने वाली एक पवित्र संस्था मानी जाती थी, लेकिन अब यह संदेह, अविश्वास और डर के साये में खड़ी दिखाई दे रही है। मीडिया में लगातार आने वाली खबरें, झूठी शिकायतें, कानून का दुरुपयोग और पारिवारिक संघर्षों के सार्वजनिक तमाशे युवाओं के मन में विवाह के प्रति भ्रम पैदा कर रहे हैं। ‘विवाह करने का मेरा निर्णय सही है ना?’ ऐसा प्रश्न उन्हें सता रहा है।

महिलाओं के संरक्षण के लिए बनाए गए दहेज निषेध, घरेलू हिंसा रोकथाम, और यौन उत्पीड़न विरोधी प्रावधान जैसे कानून समय की मांग थे। इन कानूनों से कई महिलाओं को न्याय मिला, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन कुछ मामलों में इनका इस्तेमाल दबाव बनाने के हथियार के रूप में हो रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। मुंबई में कार्यरत एक डॉक्टर का उदाहरण बहुत कुछ कहता है। शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इस दुख से उबरने से पहले ही पत्नी के घरवालों की ओर से दस लाख रुपये ‘मुआवजे’ की मांग की गई। पैसे देने से इनकार करने पर दहेज हत्या की शिकायत दर्ज करा दी गई। विशेष बात यह है कि पति-पत्नी दोनों मुंबई में अलग रहते थे। प्रत्यक्ष संबंध न होने के बावजूद सास, देवर, ननद और पूरे परिवार पर मामले दर्ज हो गए। पूरे परिवार की दुर्दशा हो गई। समझौते के प्रयास हुए, लेकिन वे आर्थिक लेन-देन से जुड़े थे। स्नेह से दिए गए उपहारों पर भी दहेज का ठप्पा लगा दिया गया। इससे यह प्रश्न उठता है कि ‘कानून संरक्षण देता है या पूरे परिवार को बंधक बना रहा है?’

शादी होते ही मामूली विवाद में पूरे परिवार पर केस दर्ज होना, बुजुर्ग माता-पिता को अदालत में घसीटा जाना, और समझौते के नाम पर आर्थिक व मानसिक उत्पीड़न जैसी घटनाओं के उदाहरण बढ़ रहे हैं, ऐसा कई वकील, काउंसलर और न्यायिक निरीक्षण बताते हैं। दुर्भाग्य से, ऐसे मामलों में कुछ माता-पिता भी अपनी बेटी की गलती को नजरअंदाज कर ‘कानून हमारे पक्ष में है’ की भूमिका में खड़े हो जाते हैं। इससे न्याय की संकल्पना संदेह के घेरे में आ जाती है। लंबी वैवाहिक जिंदगी, छोटा बच्चा होने पर भी पति की मृत्यु के बाद कुछ ही हफ्तों में दूसरे रिश्ते में जाना और उसके बाद भी पति की पैतृक संपत्ति पर अधिकार जताने की घटनाएं सामने आ रही हैं। व्यक्तिगत जीवन जीने का अधिकार सभी को है, लेकिन मृत पति की संपत्ति पर अधिकार जताते समय रिश्तों के भावनात्मक मूल्यों की अनदेखी होती है, यह खेदजनक है। यहाँ प्रश्न नैतिकता का है।

भरण-पोषण (Alimony) अन्यायग्रस्त महिला के लिए कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। लेकिन कुछ मामलों में यह पुनर्वास का साधन न रहकर दबाव का हथियार बनता दिखाई दे रहा है। पति के पास सीमित आय, बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी या अन्य समस्याएं होने के बावजूद बड़ी रकम की मांग की जाती है। काम करने में सक्षम होने के बावजूद नौकरी न करते हुए केवल भरण-पोषण पर निर्भर रहने की मानसिकता प्रश्न खड़े करती है। भरण-पोषण तय करते समय दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, जिम्मेदारियों और परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है, ऐसा न्यायालय ने समय-समय पर स्पष्ट किया है। अन्यथा, एक व्यक्ति के संरक्षण के लिए पूरा परिवार जीवन भर आर्थिक बोझ तले दब जाता है, लेकिन इसकी अनदेखी कर भरण-पोषण के लिए दबाव बनाया जाता है।

माता-पिता द्वारा अपनी इच्छा या अपेक्षा के विरुद्ध विवाह करा देने के कारण रिश्तों में दूरियां आती हैं। लेकिन असहमति जताने या संवाद साधने के बजाय कुछ चरम घटनाओं में हिंसक रास्ते अपनाए जा रहे हैं, जिससे मेघालय ‘लापता हनीमून कपल’ और राजस्थान हत्याकांड जैसी घटनाएं घट रही हैं। अपनी इच्छा को प्राथमिकता न मिलने के गुस्से में रिश्ते तोड़ना, कानून का सहारा लेकर पति को परेशान करना या अत्यंत चरम स्थिति में आपराधिक कृत्यों तक जाना, यह प्रवृत्ति समाज को अंतर्मुख करने वाली है। यहाँ प्रश्न स्त्री या पुरुष का नहीं, बल्कि ‘जिम्मेदारी न स्वीकारने की मानसिकता’ का है। विवाह केवल सामाजिक दबाव में पूरा की जाने वाली रस्म नहीं है, बल्कि इसे स्वीकारने के बाद इसके पीछे के कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से निभाया जाना चाहिए।

माता-पिता को भी लड़के-लड़कियों की सहमति को केवल औपचारिक न रखते हुए, वह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर है या नहीं, इसकी पुष्टि करना आवश्यक है। अन्यथा, ऐसी घटनाओं से पैदा होने वाला डर केवल एक परिवार तक सीमित न रहकर पूरे समाज के विश्वास पर चोट करता है। यहाँ एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी महिलाएं कानून का दुरुपयोग करती हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत और अन्यायपूर्ण है। जैसे कुछ पुरुषों द्वारा अन्याय होता है, वैसे ही कुछ महिलाओं द्वारा भी गलत व्यवहार होता है। यहाँ प्रश्न लिंग का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, नैतिकता और सत्यता का है। कानूनों को कमजोरों का संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उनका इस्तेमाल हथियार के रूप में प्रतिशोध, स्वार्थ या दबाव के लिए नहीं होना चाहिए। परिवारों को भी, चाहे बेटा हो या बेटी, 'गलती गलती होती है', यह भूमिका अपनानी चाहिए। समाज को भावनाओं में बहे बिना वस्तुस्थिति को देखना चाहिए।

इस पूरी पृष्ठभूमि में कई युवा विवाह को लेकर आशंकित हो गए हैं। शादी यानी प्रेम, सहयोग और समर्पण की संकल्पना अब जोखिम, कानूनी जटिलता और मानसिक तनाव में उलझती जा रही है। परिणामस्वरूप विवाह टालना, देर से करना या रिश्तों से दूर रहना, आज की युवा पीढ़ी ऐसे विकल्प स्वीकार करती दिखाई दे रही है।

विवाह संस्था पर बढ़ता अविश्वास केवल कानून के कारण नहीं, बल्कि संवाद के अभाव और जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति के कारण पैदा हो रहा है। विवाह-पूर्व स्पष्ट संवाद और काउंसलिंग, शिकायतों की संवेदनशील लेकिन सख्त जांच, पारिवारिक विवादों के लिए काउंसलिंग के तरीकों का प्रभावी उपयोग और अधिकारों जितनी ही कर्तव्यों की जागरूकता, ये चार स्तंभ मजबूत हुए तो रिश्तों में डर कम होगा। अन्यथा, शादी का निर्णय सहजीवन का नहीं, बल्कि जोखिम स्वीकारने का बनकर रह जाएगा। विवाह संस्था को टिकाना है, तो युवा पीढ़ी के मन में पैदा हो रहे डर को दूर कर विश्वास फिर से खड़ा करना होगा। अन्यथा, 28 साल का वह युवक केवल प्रश्न पूछने वाला न रहकर ‘विवाह चाहिए ही नहीं’ यह दृढ़ता से कहने वाली पीढ़ी का प्रतीक बन जाएगा।

Updated On 5 Jan 2026 2:50 PM IST
Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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