भारतीय शिक्षण मंडल के तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी में प्राचीन से आधुनिक काल तक के वैज्ञानिकों के योगदान और नवाचारों को पोस्टरों के माध्यम से दर्शाया गया।

प्राचीन से आधुनिक काल तक के महान वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों—आर्यभट्ट से लेकर रामचंद्रन तक (आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, सुश्रुत, चरक, सत्येंद्रनाथ बोस, जगदीश चंद्र बोस, प्रफुल्ल चंद्र राय, सीवी रमन, जी. एन. रामचंद्रन, विभा चौधरी)—के जीवन, कार्य और अद्वितीय योगदान को आकर्षक पोस्टरों के माध्यम से प्रस्तुत करती हुई “भारतीय वैज्ञानिक प्रतीकों” पर आधारित एक भव्य और प्रेरणादायी पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय इकाई, भारतीय शिक्षण मंडल (अनुसंधान गतिविधि) के तत्वावधान में विश्वविद्यालय परिसर में किया गया। यह कार्यक्रम भारतीय शिक्षण मंडल, चित्तौड़ प्रांत के अध्यक्ष तथा राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के माननीय कुलगुरु प्रो. आनन्द भालेराव के कुशल मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

प्रदर्शनी का मूल उद्देश्य और विद्यार्थियों की सहभागिता

इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में अनुसंधान के प्रति जिज्ञासा, नवाचार की भावना और राष्ट्रनिर्माण के प्रति उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना रहा। आयोजन के दौरान विद्यालयी विद्यार्थियों ने अपने जीवंत वैज्ञानिक मॉडलों का प्रदर्शन किया तथा विज्ञान के नवीन विचारों पर आधारित पोस्टर प्रस्तुत कर अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया। यह प्रदर्शनी न केवल भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों का उत्सव रही, बल्कि नई पीढ़ी को अनुसंधान, नवाचार और राष्ट्रनिर्माण की दिशा में प्रेरित करने का महत्वपूर्ण प्रयास भी सिद्ध हुई।

कुलगुरु प्रो. आनन्द भालेराव का प्रेरणादायी संदेश

इस विशेष अवसर पर कुलगुरु प्रो. आनन्द भालेराव ने अपने संदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि— "भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के वैज्ञानिक नवाचारों की सशक्त आधारशिला है। आर्यभट्ट से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक भारत की वैज्ञानिक यात्रा यह दर्शाती है कि सीमित संसाधनों में भी असीम संभावनाएँ निहित होती हैं। आज आवश्यकता है कि हम भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ते हुए नई पीढ़ी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करें। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम बनाते हैं।"

भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और वैश्विक गौरव

कार्यक्रम के दौरान यह विचार प्रमुखता से उभरा कि ज्ञान की परंपरा भारत भूमि की आत्मा रही है। तक्षशिला और नालंदा से लेकर आधुनिक अनुसंधान संस्थानों तक भारत ने विज्ञान को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज की प्रगति का माध्यम बनाया है। प्रदर्शनी में उन महान भारतीय वैज्ञानिकों की यात्रा को प्रमुखता से रेखांकित किया गया, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया। उपस्थित विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने प्रदर्शनी को अत्यंत प्रेरणादायक बताया तथा इसे विज्ञान और संस्कृति के समन्वय का सशक्त उदाहरण कहा।

आयोजकों का योगदान और सामूहिक प्रयास

आयोजकों की टीम में डॉ. विश्वनाथ तिवारी, डॉ. जयप्रकाश त्रिपाठी, राजीव एम.एम, ज्ञानरंजन पांडा, प्रमोद कांबले, मानस नाग, गौरव धुले, रोहित खटाना, राज कुमार, विकास पाठक, दर्शना हजारिका, रुश्म दास, त्र्यंबक बसाक, अवनीश शर्मा, गौतम मिश्रा, सचिन चौबे, निखिल समोटा, ज्ञान कुमार सोनिक, देवेंद्र बैरवा तथा अन्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति गर्व की भावना भी उत्पन्न करते हैं।

Pratahkal Bureau

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