ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच भारतीय बाज़ार की रॉकेट रफ़्तार! जानिए कैसे ऐतिहासिक युद्धों और संकटों के बावजूद दलाल स्ट्रीट ने निवेशकों को दिया बंपर रिटर्न।

Indian Share Market History in War : इतिहास की गलियों में एक पुरानी कहावत मशहूर है—"जब सड़कों पर खून बह रहा हो, तब खरीदारी का सबसे सही समय होता है।" आज के वैश्विक परिदृश्य में, विशेषकर ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव के बीच, भारतीय शेयर बाज़ार ने एक बार फिर इस विरोधाभासी सत्य को प्रमाणित किया है। जहां एक ओर मिसाइलों के धुएं ने वैश्विक आसमान को ढका है, वहीं दूसरी ओर दलाल स्ट्रीट के सूचकांकों ने अपनी चमक बिखेरकर विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है। यह कहानी केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि बाज़ार के उस मनोविज्ञान की है जो युद्ध की विभीषिका के बीच भी विकास के अवसर तलाश लेता है।

इतिहास का पन्ना: भय से रिकवरी तक का सफर

युद्ध और बाज़ार का रिश्ता हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यदि हम पीछे मुड़कर देखें, तो जुलाई 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के आगाज़ ने न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज जैसे दिग्गजों के भी ताले लगवा दिए थे। जनवरी 1915 में जब बाज़ार दोबारा खुला, तो गिरावट ऐतिहासिक थी, लेकिन उसके बाद आई स्थिरता और लंबी अवधि की रिकवरी ने आधुनिक अर्थशास्त्र की नींव रखी। भारतीय बाज़ारों ने भी इसी नक्श-ए-कदम पर चलते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

  • 1990-91 खाड़ी युद्ध : युद्ध की आहट पर सेंसेक्स 18 प्रतिशत तक गोता लगा गया था, लेकिन युद्ध शुरू होने के अगले छह महीनों के भीतर ही इसमें 50 प्रतिशत की रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि देखी गई।
  • 1999 कारगिल युद्ध : घुसपैठ की खबरों ने निफ्टी को शुरुआत में 13 प्रतिशत नीचे धकेला, पर छह महीने बीतते-बीतते बाज़ार 31 प्रतिशत की छलांग लगा चुका था।
  • 2003 इराक संकट : बाज़ार की शुरुआती 6 प्रतिशत की घबराहट जल्द ही 31 प्रतिशत की तेज़ी में बदल गई।

इतना ही नहीं, आतंकी हमलों जैसे काले दिनों में भी बाज़ार का जुझारूपन देखने लायक रहा। 26/11 के मुंबई हमलों के बाद बाज़ार ढह गए थे, लेकिन एक साल के भीतर निवेशकों को 82 प्रतिशत का अविश्वसनीय रिटर्न मिला। पुलवामा, बालाकोट और हालिया रूस-यूक्रेन संघर्ष भी इसी पैटर्न के गवाह रहे हैं—शुरुआती तेज गिरावट और फिर मध्यम अवधि में एक सुदृढ़ सुधार।

ऑपरेशन सिंदूर और मौजूदा स्थिति :

हालिया घटनाक्रमों की बात करें तो 7 मई, 2025 को 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान बाज़ार ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया। हमले वाले दिन सेंसेक्स भारी गिरावट के साथ खुला, लेकिन दिन खत्म होते-होते निवेशकों की लिवाली ने इसे 800 अंक ऊपर पहुंचा दिया। विश्लेषकों का मानना है कि कारगिल और उरी हमलों की तरह ही सिंदूर हमले का प्रभाव भी एक 'शॉर्ट-टर्म' करेक्शन तक सीमित रहा, जिसका कोई दीर्घकालिक नकारात्मक असर नहीं दिखा।

कच्चा तेल: बाज़ार की असली चिंता :

हालांकि बाज़ार युद्ध से नहीं डरता, लेकिन वह 'तेल' की अनिश्चितता से जरूर सहम जाता है। जेएम फाइनेंशियल जैसी दिग्गज ब्रोकरेज फर्मों के अनुसार, असली खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में होने वाली संभावित बाधा है। यदि यहाँ से आपूर्ति प्रभावित होती है, तो ब्रेंट क्रूड $90 से $100 प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति घातक हो सकती है, क्योंकि:

  • उच्च मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ेगा।
  • चालू खाता घाटा (CAD) में विस्तार होगा।
  • रुपये की विनिमय दर में कमजोरी आएगी।

सेक्टर-वार प्रभाव और भविष्य की राह

वर्तमान तनाव के बीच बाज़ार के विभिन्न क्षेत्रों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ने की संभावना है:

नकारात्मक प्रभाव: तेल विपणन कंपनियां (OMCs), विमानन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र बढ़ती लागत के कारण दबाव में रह सकते हैं। इसके साथ ही बैंक और ऑटो जैसे ब्याज दर संवेदनशील क्षेत्रों में अस्थिरता आ सकती है।

सकारात्मक प्रभाव: ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया जैसी अपस्ट्रीम कंपनियों को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से लाभ होगा। वहीं, एचएएल (HAL) और बीईएल (BEL) जैसी रक्षा कंपनियों को बढ़ते रक्षा ऑर्डर की उम्मीद से मजबूती मिलने के आसार हैं।

Updated On 2 March 2026 12:38 PM IST
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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