आसमान में गरज रहा है हिंदुस्तान! भारत के सुखोई और थाईलैंड के ग्रिपेन ने मिलकर रचा इतिहास। क्या इस आसमानी ताकत को देख दुश्मन देशों की बढ़ेगी टेंशन? देखें कैसे सुखोई ने हवा में दिखाए हैरतअंगेज करतब!

Indian Air Force Thailand Air Exercise 2026 : हिंद महासागर से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया के आसमान तक, भारत अपनी सामरिक धमक को और मजबूत कर रहा है। भारतीय वायु सेना (IAF) और रॉयल थाई एयर फोर्स (RTAF) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संयुक्त वायु अभ्यास का आगाज किया है, जिसने वैश्विक रक्षा गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। बादलों के बीच सुखोई-30MKI और ग्रिपेन जैसे घातक लड़ाकू विमानों की जुगलबंदी न केवल दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा तालमेल का प्रमाण है, बल्कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का एक शक्ति प्रदर्शन भी है।

इस उच्च-स्तरीय युद्धाभ्यास में भारतीय वायु सेना अपनी अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान सुखोई-30MKI, हवा में दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने वाले 'एयरबॉर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम' (AWACS) और आसमान में ही ईंधन भरने वाले आईएल-78 रिफ्यूलिंग विमानों के साथ उतरी है। दूसरी ओर, थाईलैंड के घातक ग्रिपेन फाइटर जेट्स ने हवा में भारतीय विमानों के साथ जटिल संचालनात्मक समन्वय (Interoperability) का प्रदर्शन किया। इस अभ्यास का प्राथमिक केंद्र दोनों वायु सेनाओं के बीच सामरिक समझ विकसित करना और वास्तविक युद्ध जैसी स्थितियों में आपसी तालमेल को परखना है।

मैत्री और सुरक्षा का त्रिकोण: थल, नभ और जल

भारत और थाईलैंड के बीच यह रक्षा सहयोग केवल वायु सीमा तक सीमित नहीं है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह सक्रियता भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का एक अभिन्न हिस्सा है। इससे पहले दोनों देशों की थल सेनाओं ने मेघालय के उमरोई में 'मैत्री' अभ्यास के जरिए अपनी क्षमता का लोहा मनवाया था। उस दौरान जवानों ने बस अपहरण जैसे हालातों से निपटने, आतंकियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने और दुर्गम जंगलों में 'सर्वाइवल ड्रिल्स' जैसे कठिन ऑपरेशन्स का सफलतापूर्वक प्रशिक्षण लिया था।

समुद्री मोर्चे पर भी भारत अपनी 'सागर मैत्री' पहल के तहत थाईलैंड के साथ वैज्ञानिक और सामरिक संबंध प्रगाढ़ कर रहा है। हाल ही में डीआरडीओ का समुद्र-विज्ञान अनुसंधान पोत 'आईएनएस सागरध्वनि' थाईलैंड पहुँचा था, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में वैज्ञानिक सहभागिता और सामाजिक-आर्थिक सहयोग को बढ़ाना था।

अभ्यास के मुख्य घटक और तकनीकी पक्ष :

इस वायु अभ्यास की जटिलता और महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • एरियल कॉम्बैट मिशन : सुखोई और ग्रिपेन के बीच 'डॉगफाइट' और हवाई हमले का अभ्यास।
  • लॉजिस्टिक सपोर्ट : आईएल-78 विमानों के जरिए हवा में ईंधन भरने की क्षमता का प्रदर्शन, जो लंबी दूरी के मिशन के लिए अनिवार्य है।
  • अर्ली वॉर्निंग सिस्टम : AWACS के माध्यम से दुश्मन के रडार को चकमा देने और जासूसी करने का प्रशिक्षण।
  • सामरिक स्थिरता : दक्षिण-पूर्व एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों देशों की वायु सेनाओं का एक साथ उड़ना।



भारत-थाईलैंड का यह संयुक्त अभ्यास केवल एक सैन्य ड्रिल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक सशक्त संदेश है। जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बढ़ते वैश्विक खतरों के बीच, दो मित्र राष्ट्रों का इस स्तर पर सहयोग करना क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को नई मजबूती प्रदान करता है। यह अभ्यास भविष्य में दोनों सेनाओं के बीच गहरे विश्वास और आधुनिक तकनीक के आदान-प्रदान के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, जो हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

Updated On 11 Feb 2026 7:52 PM IST
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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