शांति की ओर बढ़ते कदम: असम और अरुणाचल के बीच खिंची 'भाईचारे' की लकीर, जानें क्यों है यह खास।
असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच दशकों पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 'सेइजोसा' में पहला सीमा स्तंभ (Boundary Pillar) स्थापित किया गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे क्षेत्रीय शांति के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया है।

The first border pillar between Assam and Arunachal Pradesh erected at Seijosa
असम-अरुणाचल सीमा विवाद: शांति और सहयोग के एक नए युग का आगाज
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के इतिहास में सोमवार का दिन एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच पिछले कई दशकों से चला आ रहा सीमा विवाद अब स्थायी समाधान की ओर बढ़ चला है। इस दिशा में एक ठोस और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, अरुणाचल प्रदेश के पाक्के-केसांग जिले के सेइजोसा (Seijosa) क्षेत्र में पहला औपचारिक 'सीमा स्तंभ' (Boundary Pillar) स्थापित किया गया है।
यह केवल कंक्रीट का एक ढांचा नहीं है, बल्कि दो राज्यों के बीच आपसी विश्वास, सम्मान और शांति का प्रतीक है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटनाक्रम को एक "ऐतिहासिक मील का पत्थर" बताया है।
विवाद की पृष्ठभूमि और समाधान की पहल
असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच लगभग 804 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है। 1987 में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद से ही दोनों राज्यों के बीच सीमांकन को लेकर मतभेद रहे हैं। कई स्थानों पर जमीन के हक को लेकर स्थानीय स्तर पर तनाव की खबरें आती रहती थीं।
हालांकि, 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में इस विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया में तेजी आई। 15 जुलाई, 2022 को दोनों राज्यों के बीच 'नामसाई घोषणा' (Namsai Declaration) पर हस्ताक्षर हुए, जिसके बाद विवादित क्षेत्रों की संख्या को कम करने पर सहमति बनी। इसी कड़ी में अप्रैल 2023 में नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने पिलर लगाने का रास्ता साफ किया।
सेइजोसा में पहला पिलर: क्यों है यह महत्वपूर्ण?
सेइजोसा में पहले सीमा स्तंभ की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि कागजों पर हुए समझौते अब धरातल पर उतर रहे हैं। सर्वे ऑफ इंडिया (Survey of India) की देखरेख में और दोनों राज्यों के प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया के माध्यम से खुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह कदम न केवल सीमाओं को स्पष्ट करेगा, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के मन से डर और अनिश्चितता को भी खत्म करेगा। जब सीमाएं स्पष्ट होती हैं, तो विकास कार्यों को गति मिलती है और पुलिस व प्रशासन के बीच समन्वय बेहतर होता है।
स्थानीय लोगों के जीवन पर प्रभाव
अक्सर देखा जाता है कि सीमा विवाद का सबसे बुरा असर उन ग्रामीणों पर पड़ता है जो इन क्षेत्रों में रहते हैं। स्कूल, अस्पताल या सड़क बनाने जैसे बुनियादी कामों में भी 'अधिकार क्षेत्र' को लेकर रुकावटें आती थीं। पिलर लगने से अब यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सा क्षेत्र किस राज्य के अधीन है। इससे सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक बिना किसी बाधा के पहुँच सकेगा।
यह पिलर उन हजारों परिवारों के लिए राहत की खबर है जो वर्षों से इस बात को लेकर असमंजस में थे कि उनका भविष्य किस राज्य के प्रशासन के साथ जुड़ा है। अब वे बिना किसी क्षेत्रीय विवाद के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ रह सकेंगे।
क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास
पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद और आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों के बीच आपसी तालमेल बहुत जरूरी है। असम और अरुणाचल के बीच यह सुलह पूरे उत्तर-पूर्व के लिए एक मॉडल पेश करती है। मुख्यमंत्री सरमा के अनुसार, यह समाधान 'टीम नॉर्थ-ईस्ट' की भावना को मजबूत करता है। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि अंतर-राज्यीय व्यापार और परिवहन भी सुगम होगा।
असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच सेइजोसा में पहले सीमा पिलर की स्थापना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक मानवीय दृष्टिकोण की जीत है। यह दिखाता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और आपसी संवाद हो, तो बड़े से बड़े विवाद को सुलझाया जा सकता है। आने वाले समय में अन्य चिन्हित स्थानों पर भी इसी तरह पिलर लगाए जाएंगे, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि आने वाली पीढ़ियों को विरासत में विवाद नहीं, बल्कि विकास और भाईचारा मिले।

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