25 फरवरी 2026 को सर्वार्थ सिद्धि योग के शुभ संयोग में रोहिणी व्रत मनाया जाएगा। जैन और हिंदू धर्म के इस महत्वपूर्ण उपवास में भगवान वासुपूज्य की आराधना और नक्षत्र गणना का विशेष महत्व है। जानिए रोहिणी नक्षत्र का समय, पूजा विधि और इस दिन बनने वाले विशेष ज्योतिषीय योगों के बारे में विस्तृत जानकारी।

नई दिल्ली। भारतीय अध्यात्म और संस्कृति के पटल पर नक्षत्रों की गणना का विशेष महत्व रहा है, और इसी क्रम में 25 फरवरी 2026, बुधवार का दिन श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम लेकर आ रहा है। जैन और हिंदू दोनों ही धर्मों में समान रूप से पूजनीय 'रोहिणी व्रत' इस बार अत्यंत दुर्लभ और शुभ 'सर्वार्थ सिद्धि योग' के साये में मनाया जाएगा। यह व्रत न केवल धार्मिक निष्ठा का प्रतीक है, बल्कि इसे जीवन के दुखों के निवारण और सौभाग्य की प्राप्ति का एक सशक्त माध्यम माना जाता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर किए गए जप और तप का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है, जो इस वर्ष के रोहिणी व्रत को और भी अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।

धार्मिक मान्यताओं की गहराई में उतरें तो जैन समुदाय में यह व्रत 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की आराधना को समर्पित है। श्रद्धालु अपनी आंतरिक शुद्धि और सांसारिक बाधाओं से मुक्ति के लिए इस दिन मौन और संयम का मार्ग चुनते हैं। वहीं, हिंदू धर्म में भी कई क्षेत्रों में महिलाएं अपने परिवार की समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ रखती हैं। इस व्रत की परंपरा अत्यंत कठोर और अनुशासित है, जहाँ साधक अक्सर इसे तीन, पांच या सात वर्षों के लंबे संकल्प के साथ निभाते हैं और अंततः विधि-विधान से इसका उद्यापन करते हैं। यह निरंतरता साधक के धैर्य और अटूट विश्वास को दर्शाती है।

समय और मुहूर्त के सूक्ष्म विश्लेषण पर नजर डालें तो रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव 24 फरवरी को दोपहर 03:07 बजे से ही प्रारंभ हो चुका है, किंतु शास्त्रों के अनुसार उदय तिथि की प्रधानता के चलते 25 फरवरी को ही मुख्य व्रत रखा जाएगा। कल सूर्योदय के समय रोहिणी नक्षत्र की उपस्थिति इसे व्रत के लिए शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ बना रही है। विशेष बात यह है कि नक्षत्र का समापन दोपहर 01:38 बजे होगा, जिसके पश्चात मृगशिरा नक्षत्र का आगमन होते ही पारण की प्रक्रिया पूर्ण की जा सकेगी। इस दौरान पूरे दिन व्याप्त रहने वाला सर्वार्थ सिद्धि योग किसी भी नए कार्य के शुभारंभ और मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए एक ईश्वरीय आशीर्वाद के समान देखा जा रहा है।

कल की पूजा पद्धति में शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाएगा। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के पश्चात श्वेत या पीत वस्त्र धारण कर भगवान वासुपूज्य अथवा भगवान कृष्ण का अभिषेक किया जाएगा। पुष्प, फल और नैवेद्य के अर्पण के साथ 'ॐ ह्रीं श्रीं वासुपूज्य जिनेन्द्राय नमः' जैसे प्रभावशाली मंत्रों का गुंजन वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देगा। यह आयोजन केवल एक उपवास मात्र नहीं है, बल्कि यह समय की उस गणना का सम्मान है जो सदियों से भारतीय जनमानस को प्रकृति और नक्षत्रों से जोड़ती आई है। जैसे ही कल दोपहर नक्षत्र का परिवर्तन होगा, श्रद्धालुओं का यह संकल्प पूर्णता को प्राप्त करेगा, जो समाज में शांति और खुशहाली की नई किरण लेकर आएगा।

Updated On 24 Feb 2026 5:03 PM IST
Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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