संकष्टी चतुर्थी की प्राचीन कथा में निर्धन पत्नी की भक्ति और भगवान गणेश के आशीर्वाद की दास्तान है। छोटी बहन के घर भगवान गणेश ने सोने और आभूषणों से धन बरसाया, जबकि बड़ी बहन के लोभ और चालाकी पर शाप पड़ा। कथा भक्ति, सत्य और उदारता का संदेश देती है।

संकष्टी चतुर्थी का पर्व सदियों से भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह दिन भगवान गणेश की विशेष कृपा और व्रतियों की भक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन से जुड़ी एक प्राचीन कथा आज भी लोगों के विश्वास और श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।

कहानी दो सासुरालियों और उनके पतियों के इर्द‑गिर्द घूमती है। दोनों पति एक ही परिवार के थे, लेकिन बड़ा भाई संपन्न और छोटा भाई निर्धन था। छोटा भाई लकड़ी बेचकर अपना और पत्नी का भरण-पोषण करता था। उसकी पत्नी भगवान गणेश की अनन्य भक्त थी और प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी व्रत करती थी।

व्रत के दिन, निर्धन पत्नी के पास भोजन बनाने के लिए सामग्री नहीं थी। उसने बड़ी सासुराल में काम करके कुछ पैसे कमाने का प्रयास किया। लेकिन बड़ी सास ने व्रत के दिन उसकी मेहनत का पारितोषिक देने से मना कर दिया और कहा कि उसका भुगतान अगले दिन पूजा के बाद ही किया जाएगा। थककर वह महिला खाली हाथ घर लौट आई। संध्या समय, जब उसका पति काम से लौटा, उसने पत्नी को भोजन परोसने में असमर्थ देखा। क्रोधित होकर उसने पत्नी को डांटा। निराश और भूखी महिला उसी रात सो गई।

रात्रि में भगवान गणेश उसके घर आए। जब उन्होंने दरवाजा खोलने को कहा, महिला ने कहा कि सभी दरवाजे खुले हैं, क्योंकि घर में बंद करने के लिए कुछ नहीं है। भगवान गणेश ने भोजन की इच्छा जताई, तो महिला ने कहा कि सुबह से बथुआ पका हुआ है, आप वह खा लें। भोजन करने के बाद जब भगवान गणेश को शौच की आवश्यकता हुई, महिला ने घर के सभी कोनों और प्रवेशद्वार को उनके लिए खोल दिया। जब उन्होंने पोंछने के लिए कुछ माँगा, महिला ने कहा, “मेरा माथा उपयोग करें।”

अगली सुबह महिला ने देखा कि उसके माथे, घर के चारों कोनों और प्रवेशद्वार पर अनमोल हीरे, आभूषण और सोना बिखरा हुआ था। तब उसे एहसास हुआ कि यह सपना नहीं, वास्तविकता थी और भगवान गणेश ने उनके परिवार को धन और समृद्धि से आशीर्वाद दिया।

इसके बाद बड़ी सास ने भी वही प्रयास करने का निर्णय लिया। उसने व्रत और घटनाओं को हू-ब-हू दोहराया, लेकिन इस बार उसे सोने और हीरों के बजाय घिनौना मल और दुर्गंध प्राप्त हुई। पंडितों ने सलाह दी कि महिला को धन को समान रूप से छोटी बहन के साथ बाँटना होगा। जब उसने ऐसा किया, तब भी समस्या बनी रही। अंततः पता चला कि एक हार बाँटा नहीं गया था। हार बांटते ही भगवान गणेश का शाप समाप्त हुआ।

इस कथा से स्पष्ट होता है कि संकष्टी चतुर्थी व्रत में भक्ति, सत्य और उदारता की महत्ता है। आज भी लोग भगवान गणेश से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस कथा से प्रेरणा लेते हैं और व्रत के नियमों का पालन करते हैं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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