काशी विश्वनाथ मंदिर में ७५० साल पुरानी परंपरा के साथ होली का भव्य आगाज़ हुआ। सप्तऋषि आरती में बाबा को प्रथम गुलाल अर्पित कर रंगोत्सव का शंखनाद किया गया। जानिए कैसे यह प्राचीन परंपरा रंगभरी एकादशी और मणिकर्णिका घाट की 'मसाने की होली' का आधार बनती है और क्यों महादेव को गुलाल चढ़ाए बिना काशी में होली अधूरी मानी जाती है।

मोक्ष की नगरी काशी में जब चहुंओर डमरूओं की गूंज और वैदिक मंत्रोच्चार का संगम होता है, तब समझ लेना चाहिए कि महादेव के आंगन में ऋतुराज बसंत के आगमन का उल्लास छा गया है। सात सौ पचास वर्षों की अटूट परंपरा को जीवंत करते हुए, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सप्तऋषि आरती के साथ ही विश्व प्रसिद्ध काशी की होली का औपचारिक शुभारंभ हो गया है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस अविनाशी संस्कृति का प्रतिबिंब है जहां काल के अधिपति स्वयं अपने भक्तों के साथ अबीर-गुलाल की होली खेलकर उत्सव की मर्यादा निर्धारित करते हैं। मान्यता है कि संपूर्ण विश्व में होली का रंग चढ़ने से पूर्व, महादेव के चरणों में गुलाल अर्पित कर उनसे इस पर्व की अनुमति ली जाती है, जो काशी की इस प्राचीन नगरी को शेष जगत से पृथक और दिव्य बनाती है।

इस पावन परंपरा का मूल लगभग साढ़े सात शताब्दियों पूर्व के विद्वान ब्राह्मणों और संतों की अटूट श्रद्धा में निहित है। शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक संध्या सप्तऋषि अदृश्य रूप में बाबा विश्वनाथ की आराधना करने कैलाश से काशी की धरा पर उतरते हैं, किंतु होली के अवसर पर होने वाली यह आरती विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है। सप्तऋषियों के प्रतिनिधि के रूप में पुजारी जब बाबा के विग्रह पर अबीर और गुलाल अर्पित करते हैं, तब समूचा मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठता है। विशेष वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जब बाबा को प्रथम गुलाल चढ़ाया जाता है, तो वह क्षण इस बात का प्रमाण होता है कि अब काशी होली के सतरंगी रंगों में सराबोर होने के लिए तैयार है।

काशी के पारंपरिक पंचांग और लोक मान्यताओं के अनुसार, सप्तऋषि आरती के बिना होली का उत्सव अधूरा माना जाता है। इस आरती के उपरांत ही बाबा के दरबार से गुलाल की बौछार भक्तों पर की जाती है, जिसे महादेव का प्रसाद मानकर श्रद्धालु अपनी झोली में भर लेते हैं। यही वह निर्णायक क्षण है जो रंगभरी एकादशी के वैभवशाली मार्ग को प्रशस्त करता है। जैसे ही बाबा विश्वनाथ के दरबार से होली का 'ऑफिशियल' शंखनाद होता है, संपूर्ण काशी उत्सव के चरम की ओर बढ़ने लगती है। इसके पश्चात रंगभरी एकादशी पर बाबा मां पार्वती का गौना कराकर उन्हें काशी लाते हैं और फिर मणिकर्णिका घाट की वह कालजयी 'मसाने की होली' खेली जाती है, जो जीवन और मृत्यु के अद्वैत दर्शन को दुनिया के सामने जीवंत करती है।

धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से यह परंपरा इस सत्य को रेखांकित करती है कि काशीवासियों के लिए महादेव केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि परिवार के सर्वोच्च मुखिया हैं। जिस प्रकार घर के किसी भी मांगलिक कार्य या त्यौहार की शुरुआत कुलदेवता और बड़ों के आशीर्वाद से होती है, ठीक उसी प्रकार काशी का हर निवासी अपने 'अधिपति' के चरणों में शीश नवाकर ही रंगोत्सव का प्रारंभ करता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हुई आज भी अपनी मौलिकता और भव्यता को अक्षुण्ण रखे हुए है। अंततः, सप्तऋषि आरती के माध्यम से शुरू होने वाली यह होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि महादेव के प्रति उस अगाध समर्पण की अभिव्यक्ति है जो काशी को वास्तव में 'शिव की नगरी' सिद्ध करती है।

Updated On 2 March 2026 12:41 PM IST
Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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