पश्चिमी घाट के प्रहरी माधव गाडगिल का 83 वर्ष आयु में निधन; पर्यावरण जगत में शोक की लहर
प्रख्यात पर्यावरणविद् और 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' पुरस्कार विजेता माधव गाडगिल का 83 वर्ष की आयु में पुणे में निधन हो गया। पश्चिमी घाट के संरक्षण और गाडगिल रिपोर्ट के प्रणेता के रूप में उन्होंने भारत के पर्यावरण आंदोलन को नई दिशा दी। जानिए प्रकृति के इस सच्चे सिपाही के जीवन, संघर्ष और उनके द्वारा छोड़ी गई महान विरासत के बारे में विस्तृत रिपोर्ट।

madhav gadgil death
madhav gadgil death : भारत के पर्यावरण संरक्षण की बुलंद आवाज और पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने वाले दिग्गज पर्यावरणविद् माधव गाडगिल अब हमारे बीच नहीं रहे। पुणे के एक निजी अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। परिवार के सूत्रों द्वारा गुरुवार सुबह साझा की गई इस खबर ने देश के वैज्ञानिक और पर्यावरण प्रेमी समुदाय में शोक की लहर दौड़ दी है। बुधवार देर रात उन्होंने अंतिम सांस ली, जिससे प्रकृति के संरक्षण के लिए समर्पित एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया।
माधव गाडगिल का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक चेतना का मौन होना है जिसने विकास और विनाश के बीच की बारीक रेखा को बखूबी पहचाना था। साल 2024 में, उनकी दशकों की तपस्या को वैश्विक स्तर पर तब सबसे बड़ी मान्यता मिली, जब संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें अपने सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' से नवाजा। यह पुरस्कार पश्चिमी घाट जैसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट को बचाने के लिए उनके द्वारा किए गए क्रांतिकारी शोध और निस्वार्थ समर्पण का प्रमाण था।
गाडगिल की सबसे बड़ी विरासत 'पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल' (WGEEP) की अध्यक्षता रही। उनके नेतृत्व में तैयार की गई ऐतिहासिक रिपोर्ट ने भारत सरकार को आगाह किया था कि पश्चिमी घाट का नाजुक संतुलन जनसंख्या के बढ़ते दबाव, अनियंत्रित विकास गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के घातक प्रहारों के कारण ढहने की कगार पर है। यद्यपि उनके सुझावों पर लंबे समय तक बहस होती रही, लेकिन आज जब प्रकृति अपनी विनाशकारी शक्ति दिखाती है, तो गाडगिल की चेतावनी सबसे सटीक साबित होती है। उन्होंने न केवल डेटा और फाइलों में काम किया, बल्कि जमीन पर उतरकर जंगलों और वहां रहने वाले समुदायों के अधिकारों की वकालत की।
उनके निधन से पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसी रिक्तता पैदा हो गई है जिसे भरना लगभग असंभव है। माधव गाडगिल ने अपने पीछे शोध का वो समृद्ध खजाना छोड़ा है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा। आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और पारिस्थितिक असंतुलन से जूझ रही है, गाडगिल के सिद्धांत और उनकी दूरदर्शिता पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ और वहां की जैव विविधता हमेशा अपने इस महान 'पहरेदार' की ऋणी रहेगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
