जब 'शशि गोडबोले' बनकर की थी वापसी ; जानें कैसे ऊँचाइयों के शिखर पर नहीं डगमगाया श्रीदेवी का हौसला
भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार श्रीदेवी का 50 वर्षों से अधिक का अद्वितीय फिल्मी सफर, बाल कलाकार से राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री तक की कहानी, पद्म श्री सम्मान, ऐतिहासिक वापसी ‘इंग्लिश विंग्लिश’ और अधूरी रह गई फिल्मों का विस्तृत विवरण।

श्रीदेवी
भारतीय सिनेमा के विस्तृत आकाश में कुछ सितारे ऐसे होते हैं, जिनकी चमक दशकों तक कायम रहती है और पीढ़ियाँ उन्हें आदर से याद करती हैं। श्रीदेवी ऐसी ही विलक्षण कलाकार थीं, जिन्हें भारतीय फिल्म उद्योग में ‘पहली महिला सुपरस्टार’ के रूप में प्रतिष्ठा मिली। पाँच दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने न केवल विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि सिनेमा में एक अभिनेत्री भी केंद्र में रहकर इतिहास रच सकती है।
13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के शिवकाशी के निकट मीनामपट्टी गाँव में जन्मी श्रीदेवी का वास्तविक नाम श्री अम्मा यंगर अय्यप्पन था। उनके पिता अय्यप्पन पेशे से वकील थे, जबकि माता राजेश्वरी आंध्र प्रदेश के तिरुपति से थीं। पारिवारिक पृष्ठभूमि साधारण थी, लेकिन प्रतिभा असाधारण। यही प्रतिभा उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्मी दुनिया तक ले आई।
बाल कलाकार से नायिका तक का सफर:
श्रीदेवी ने कन्नड़ फिल्म भक्त कुंभारा (1974) से बाल कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने बाला भारतम, यशोदा कृष्णा और हेन्नु संसारदा कन्नु (1975) जैसी फिल्मों में अभिनय किया। कम उम्र में ही कैमरे के सामने सहजता और अभिव्यक्ति की गहराई ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। हिंदी सिनेमा में बतौर नायिका उनकी शुरुआत 1979 की फिल्म सोलवा सावन से हुई, लेकिन व्यापक पहचान उन्हें 1983 में मिली।
1983–1986: हिंदी सिनेमा में धमाकेदार स्थापिती
1983 में रिलीज हुई फिल्म 'हिम्मतवाला' ने श्रीदेवी को बॉलीवुड के शिखर पर पहुंचा दिया। यह फिल्म तेलुगु फिल्म ऊरुकी मोनागाडु (1981) का रीमेक थी और बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफल रही। इस फिल्म में उनके साथ अभिनेता जितेंद्र थे, और ‘नैनों में सपना’ गीत ने दर्शकों के बीच धूम मचा दी। भव्य परिधानों और सशक्त स्क्रीन उपस्थिति ने उन्हें भीड़ से अलग खड़ा कर दिया।
इसके बाद श्रीदेवी ने हिंदी सिनेमा में एक के बाद एक सफल फिल्मों के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की। उनकी छवि एक ऐसी अभिनेत्री की बनी, जो पर्दे पर दृढ़, आत्मविश्वासी और मुखर महिला किरदारों को जीवंत कर सकती थीं, जबकि निजी जीवन में वे अपेक्षाकृत संकोची और अंतर्मुखी मानी जाती थीं।
राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान:
अपने करियर के दौरान श्रीदेवी को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें शामिल हैं:
- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
- सात फिल्मफेयर पुरस्कार (जिसमें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी शामिल)
- फिल्मफेयर अवॉर्ड्स साउथ
- तमिलनाडु राज्य फिल्म पुरस्कार
- केरल राज्य फिल्म पुरस्कार
- नंदी पुरस्कार
वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मा श्री से अलंकृत किया। यह सम्मान उनके असाधारण योगदान की औपचारिक स्वीकृति था।
विराम के बाद ऐतिहासिक वापसी:
लगभग 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद श्रीदेवी ने 2012 में फिल्म English Vinglish से शानदार वापसी की। निर्देशक गौरी शिंदे की इस फिल्म में उन्होंने शशि गोडबोले नामक एक साधारण गृहिणी का किरदार निभाया, जो अंग्रेजी न जानने के कारण उपहास का सामना करती है और आत्मसम्मान की खोज में अंग्रेजी सीखने का निर्णय लेती है।
फिल्म को आलोचकों और दर्शकों दोनों से व्यापक सराहना मिली। समीक्षकों ने इसे वर्ष 2012 की श्रेष्ठ फिल्मों में शामिल किया और श्रीदेवी के अभिनय को “अभिनय का पाठ” बताया। इस फिल्म की व्यावसायिक सफलता ने उन्हें बॉलीवुड में विवाह और लंबे अंतराल के बाद सफलतापूर्वक मुख्य नायिका के रूप में वापसी करने वाली विरली अभिनेत्री बना दिया।
टेलीविजन और अन्य रचनात्मक आयाम:
फिल्मों से दूरी के दौरान श्रीदेवी ने छोटे पर्दे पर भी उपस्थिति दर्ज कराई। 2004–2005 के सिटकॉम मालिनी अय्यर में उन्होंने अभिनय किया। वे विभिन्न टीवी कार्यक्रमों में अतिथि और जज के रूप में भी दिखाई दीं। इसके अतिरिक्त उन्हें चित्रकला में भी गहरी रुचि थी। 2010 में उनकी पेंटिंग्स एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी घर द्वारा बेची गईं और प्राप्त राशि दान कर दी गई। यह उनके व्यक्तित्व के संवेदनशील और कलात्मक पक्ष को दर्शाता है।
अंतिम उपस्थिति और अधूरी परियोजनाएँ:
2018 में फिल्म 'जीरो' में उनका कैमियो उनके जीवन का अंतिम ऑन-स्क्रीन प्रदर्शन सिद्ध हुआ। इसके बाद उन्होंने 2019 की पीरियड रोमांटिक ड्रामा कलंक के लिए अनुबंध किया था, जिसका निर्माण करण जौहर कर रहे थे। हालांकि उनके निधन के कारण इस फिल्म में उनकी जगह माधुरी दीक्षित को लिया गया। इसके अतिरिक्त, वे मलयालम फिल्म श्री श्री देवरागम में कैमियो करने वाली थीं, जो उनकी 1996 की फिल्म देवरागम का सीक्वल प्रस्तावित था। किंतु 2018 में उनके निधन के बाद यह परियोजना स्थगित कर दी गई।
एक युग का समापन, एक विरासत की शुरुआत:
श्रीदेवी का करियर केवल फिल्मों की संख्या या पुरस्कारों की सूची भर नहीं था। यह भारतीय सिनेमा में महिला कलाकारों की भूमिका के विस्तार और सशक्तिकरण का प्रतीक था। उन्होंने यह स्थापित किया कि एक अभिनेत्री भी बॉक्स ऑफिस पर केंद्र में रहकर दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सकती है। उनकी यात्रा बाल कलाकार से लेकर राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त ‘पहली महिला सुपरस्टार’ बनने तक भारतीय सिनेमा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। समय बीत सकता है, पीढ़ियाँ बदल सकती हैं, लेकिन श्रीदेवी की चमक भारतीय सिनेमा के परदे पर सदैव जीवित रहेगी।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
