‘द राजा साहब' ने पहले ही दिन तोडा बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड ; पर फिल्म को मिला 'सुस्त और उबाऊ' का टैग
प्रभास की नई फिल्म 'द राजा साहब' का रिव्यू: क्या यह सुपरस्टार की बड़ी भूल है? जानें क्यों समीक्षक इस हॉरर-कॉमेडी को एक विचित्र और सुस्त तमाशा बता रहे हैं। फिल्म के कमजोर लेखन, थके हुए प्रभास और बेतुकी कहानी से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी इस विस्तृत रिपोर्ट में। क्या 'द राजा साहब' बॉक्स ऑफिस पर टिक पाएगी या सीक्वल की खबर ने बढ़ा दी है दर्शकों की चिंता?

The Raja Saab movie review in hindi : भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार कहे जाने वाले प्रभास की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'द राजा साहब' ने बड़े पर्दे पर दस्तक तो दे दी है, लेकिन फिल्म को लेकर आ रही प्रतिक्रियाएं उम्मीदों से कोसों दूर हैं। अभिनेता ने एक हालिया साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि उन्होंने एक्शन भूमिकाओं से इतर कुछ नया और मनोरंजक करने के उद्देश्य से हॉरर-कॉमेडी शैली को चुना, परंतु परिणाम स्वरूप यह फिल्म एक ऐसा तमाशा बनकर रह गई है जहाँ मनोरंजन कम और बेतरतीब दृश्यों का शोर ज्यादा है। जिस प्रकार रजनीकांत ने 'बाबा' की असफलता के बाद 'चंद्रमुखी' के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की थी, प्रभास ने भी वैसा ही प्रयोग करने का प्रयास किया, लेकिन निर्देशक मारुति की यह कृति अपनी पहचान खोई हुई नजर आती है। फिल्म का पूरा ढांचा हॉरर, कॉमेडी और फंतासी के बीच झूलता रहता है, जिससे दर्शक अंत तक यह समझ नहीं पाते कि वे वास्तव में क्या देख रहे हैं।
फिल्म की कहानी ज़मींदारी विरासत और रहस्यमयी अतीत के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसके केंद्र में गंगा देवी (ज़रीना वहाब) और उनका पोता राजू (प्रभास) हैं। हालाँकि, पटकथा का स्तर इतना सतही है कि पात्रों के बीच का प्रेम संबंध और उनके उद्देश्य पूरी तरह से तर्कहीन प्रतीत होते हैं। मालविका मोहनन और निधि अग्रवाल जैसे कलाकारों को केवल पर्दे की शोभा बढ़ाने और नायक के इर्द-गिर्द घूमने के लिए रखा गया है, जो आज के दौर की फिल्म निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। फिल्म का लेखन इतना कमजोर है कि तीन पीढ़ियों की संपत्ति वाले जमींदार द्वारा मात्र 3 लाख रुपये की धोखाधड़ी जैसे बेतुके तर्क कहानी की गहराई को पूरी तरह समाप्त कर देते हैं। यहाँ तक कि प्रभास का स्क्रीन प्रेजेंस भी काफी थका हुआ नजर आता है और उनके भावों में वह 'बाहुबली' वाली चमक कहीं लुप्त दिखाई देती है।
तकनीकी और रचनात्मक मोर्चे पर भी 'द राजा साहब' कोई अमिट छाप छोड़ने में विफल रही है। फिल्म का पहला भाग उबाऊ दृश्यों और बेवजह के गानों से भरा हुआ है, जबकि थमन का संगीत शोर के अलावा कुछ खास अनुभव प्रदान नहीं करता। हालाँकि, दूसरे भाग में कुछ कॉमेडियन जैसे सत्य और वीटीवी गणेश ने प्रेतवाधित बंगले के दृश्यों में थोड़ी जान फूंकने की कोशिश की है, जो 'प्रेमा कथा चित्रम' की याद दिलाते हैं, लेकिन तब तक दर्शक फिल्म से अपना मोह भंग कर चुके होते हैं। दृश्य प्रभाव (VFX) कहीं-कहीं प्रभावशाली जरूर हैं, लेकिन कहानी की सुस्ती और पटकथा की उलझन उन्हें प्रभावी नहीं होने देती।
सिनेमाई गलियारों में इस फिल्म की आलोचना न केवल इसके 'घटिया लेखन' के लिए हो रही है, बल्कि इसकी 'पुरानी और दकियानूसी लैंगिक राजनीति' के लिए भी की जा रही है। फिल्म का समापन एक सीक्वल की घोषणा के साथ होता है, जिसे देखकर आलोचक इसे मनोरंजन से ज्यादा 'असली खौफ' की शुरुआत बता रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रभास का स्टारडम इस फिल्म को व्यावसायिक सफलता दिला पाएगा या फिर यह उनके करियर की एक ऐसी भूल साबित होगी जो दर्शकों को फिर से उनकी खोई हुई चमक का इंतजार करने पर मजबूर कर देगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
