क्या प्रतिभा की कोई कीमत नहीं? सुधा कोंगरा ने फिल्म इंडस्ट्री में 'पे-गैप' के काले सच से उठाया पर्दा
शनल अवॉर्ड विनर सुधा कोंगरा ने फिल्म इंडस्ट्री के 'पे-गैप' पर किया बड़ा खुलासा। समान बजट और मेहनत के बावजूद महिला निर्देशकों को पुरुष निर्देशकों से आधी फीस मिलने पर जताई नाराजगी। पढ़ें सिनेमा जगत की इस कड़वी सच्चाई पर विस्तृत रिपोर्ट।

चेन्नई/हैदराबाद: भारतीय सिनेमा के चमक-धमक वाले पर्दे के पीछे एक ऐसी कड़वी सच्चाई छिपी है, जिसने रचनात्मकता और न्याय के सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक सुधा कोंगरा, जिन्होंने 'सोरारई पोट्रु' जैसी कालजयी फिल्म से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है, ने फिल्म उद्योग में व्याप्त 'पे-गैप' (वेतन के अंतर) पर एक ऐसा विस्फोटक बयान दिया है जिसने दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग से लेकर बॉलीवुड तक में हड़कंप मचा दिया है। उनके इस खुलासे ने न केवल फिल्म निर्माण के आर्थिक ढांचे को उजागर किया है, बल्कि लैंगिक आधार पर होने वाले भेदभाव को भी मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बना दिया है।
सुधा कोंगरा ने अपने हालिया साक्षात्कार में किसी भी लाग-लपेट के बिना स्पष्ट किया कि एक महिला निर्देशक के रूप में उनकी राह कितनी चुनौतीपूर्ण रही है। उन्होंने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि जब फिल्म का बजट, मेहनत और तकनीकी जटिलता एक समान होती है, तब भी महिला निर्देशकों को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधी फीस ही दी जाती है। यह अंतर किसी अनुभव की कमी के कारण नहीं, बल्कि एक गहरी पैठ बना चुके उस सिस्टम के कारण है जो यह मानता है कि एक पुरुष निर्देशक की 'मार्केट वैल्यू' महिला निर्देशक से अधिक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सिनेमाई दृष्टिकोण और कहानी कहने की कला में लिंग का कोई स्थान नहीं होता, फिर भी पारिश्रमिक के मामले में यह अंतर चीख-चीख कर असमानता की कहानी कहता है।
इस मुद्दे के कानूनी और आधिकारिक पहलुओं पर गौर करें तो भारत का 'समान पारिश्रमिक अधिनियम' (Equal Remuneration Act) स्पष्ट रूप से लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। हालांकि, फिल्म उद्योग जैसे असंगठित और 'कॉन्ट्रैक्ट' आधारित क्षेत्र में इन नियमों का क्रियान्वयन हमेशा से एक चुनौती रहा है। सुधा कोंगरा के इस साहसिक कदम के बाद अब उद्योग के अन्य बड़े नाम भी इस बहस में कूद पड़े हैं। दक्षिण भारतीय सिनेमा के कई प्रमुख निर्देशकों और निर्माताओं के बीच अब आधिकारिक तौर पर 'पे-पैरिटी' (वेतन समानता) को लेकर आंतरिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुधा कोंगरा जैसी स्थापित निर्देशक इस भेदभाव का शिकार हैं, तो नई आने वाली महिला निर्देशकों के लिए यह संघर्ष और भी भीषण हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने केवल आर्थिक असमानता को ही नहीं, बल्कि फिल्म सेट पर पावर डायनेमिक्स को भी चुनौती दी है। सुधा कोंगरा का यह बयान उस समय आया है जब वैश्विक स्तर पर 'इक्वल पे' की लहर चल रही है। उनके इस बेबाक रुख ने उन सभी महिला फिल्मकारों को एक आवाज दी है जो वर्षों से इस खामोश शोषण को सह रही थीं। यह महज एक बयान नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की पुकार है जहाँ टैलेंट की पहचान उसके काम से नहीं, बल्कि जेंडर से तय की जाती रही है।
अंततः, सुधा कोंगरा द्वारा उठाई गई यह चिंगारी आने वाले समय में एक बड़े नीतिगत बदलाव का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। यदि भारतीय सिनेमा को वास्तव में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनना है, तो उसे अपनी प्रतिभाओं को समान अवसर और समान सम्मान देना ही होगा। समाज और फिल्म जगत अब इस दिशा में सुधा कोंगरा के दावों पर क्या प्रतिक्रिया देता है, यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह केवल पैसों की नहीं, बल्कि पेशेवर गरिमा की लड़ाई है।

