फिल्म ‘इक्कीस’ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। पाकिस्तान के चित्रण और विवादित संवादों को लेकर उठे विरोध ने कमाई पर असर डाला, जबकि समीक्षकों ने अभिनय और संयमित प्रस्तुति की सराहना की।

नई फिल्मों के लिए बॉक्स ऑफिस का पहला सप्ताह निर्णायक माना जाता है, लेकिन हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘इक्कीस’ के लिए यह दौर उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा। लगभग 60 करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म अपने शुरुआती तीन दिनों में महज़ 15 से 18 करोड़ रुपये नेट की कमाई कर पाई है। फिल्म की धीमी रफ्तार के पीछे कहानी या अभिनय से अधिक, वह विवाद है जिसने रिलीज़ के साथ ही सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में जगह बना ली।

‘इक्कीस’ एक संवेदनशील सैन्य पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म है, जो युद्ध, बलिदान और मानवीय दृष्टिकोण को संयमित भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। कहानी का केंद्र एक युवा भारतीय लेफ्टिनेंट है, जिसकी भूमिका में डेब्यू कर रहे अगस्त्य नंदा नजर आते हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि यह लेफ्टिनेंट अपने अंतिम मिशन में दुश्मन के चार टैंकों को नष्ट करता है और अंततः वीरगति को प्राप्त होता है। यह कथा भारतीय सेना के साहस और व्यक्तिगत बलिदान की भावना को रेखांकित करती है।

हालांकि, फिल्म की यही “संयमित दृष्टि” इसके लिए विवाद का कारण बन गई। खासतौर पर एक संवाद—“दुश्मन कौन है?”—और एक भावनात्मक दृश्य, जिसमें शहीद खेत्रपाल के पिता (धर्मेंद्र द्वारा अभिनीत) और एक पाकिस्तानी अधिकारी (जिन्हें जयदीप अहलावत ने निभाया है) के बीच पुनर्मिलन दिखाया गया है, ने दर्शकों के एक वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। सोशल मीडिया पर इस दृश्य को लेकर यह आरोप लगाया गया कि फिल्म भारत–पाकिस्तान संबंधों और ऐतिहासिक सच्चाइयों को “अत्यधिक मानवीय” नजरिये से दिखाती है।

विरोध करने वाले दर्शकों ने पाकिस्तान की ओर से अतीत में हुए कथित अत्याचारों का हवाला दिया। इनमें भारतीय सैनिक के सिर काटे जाने की घटनाएं और कैप्टन सौरभ कालिया के साथ हुई यातना जैसे मामले प्रमुख रूप से चर्चा में रहे। इन उदाहरणों को सामने रखते हुए कई लोगों ने फिल्म के कथानक में दिखाई गई भावनात्मक नरमी को अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप, सोशल मीडिया पर बहिष्कार की अपीलें और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आईं, जिनका सीधा असर टिकट खिड़की पर पड़ा।

इसके उलट, फिल्म समीक्षकों का एक बड़ा वर्ग ‘इक्कीस’ की कलात्मक संतुलन और अभिनय की प्रशंसा कर रहा है। अनुभवी अभिनेता धर्मेंद्र ने एक भावुक और गरिमामय पिता की भूमिका निभाई है, वहीं जयदीप अहलावत ने सीमित संवादों में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। अगस्त्य नंदा के अभिनय को भी एक गंभीर और संवेदनशील शुरुआत माना जा रहा है। समीक्षाओं में यह भी उल्लेख किया गया है कि फिल्म युद्ध को महिमामंडित करने के बजाय उसके मानवीय और भावनात्मक प्रभावों को उभारने का प्रयास करती है।

बॉक्स ऑफिस के परिदृश्य में ‘इक्कीस’ की स्थिति और जटिल हो जाती है जब इसकी तुलना इसी अवधि में रिलीज़ हुई देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्म ‘धुरंधर’ से की जाती है, जिसने 800 करोड़ रुपये से अधिक का वैश्विक कारोबार कर लिया है। तेज़ राष्ट्रवादी तेवर और स्पष्ट संदेश वाली फिल्मों के दौर में ‘इक्कीस’ का संतुलित दृष्टिकोण दर्शकों के एक बड़े वर्ग से जुड़ नहीं पाया।

अंततः, ‘इक्कीस’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय सिनेमा में देशभक्ति, इतिहास और अभिव्यक्ति की सीमा पर चल रही बहस का प्रतीक बनकर उभरी है। इसकी व्यावसायिक सफलता भले सीमित रही हो, लेकिन इसने यह सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है कि क्या दर्शक आज भी संवेदनशील और बहुस्तरीय कहानियों के लिए तैयार हैं, या सिनेमा से वे केवल स्पष्ट और आक्रामक राष्ट्रवादी कथानक ही देखना चाहते हैं।

Updated On 5 Jan 2026 3:15 PM IST
Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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