इतना बड़ा शहर है सोच कर मुझे लग रहा था कि स्टेशन बहुत बड़ा होगा एसा कोई आभास नहीं हुआ। वही छोटे से प्लेटफार्म पर हमें उतारा गया। सामान कहाँ से लेना है इसकी बराबर घोषणा हो रही थी। प्लेटफार्म से निकल कर उसी दिशा में बढ़ा तो सामने से मुनीश नजर आ गया। उसे देखकर मन प्रसन्न हो या चार दिनों की यात्रा अकेले कर लेने के बाद मैं पुनः अपनों के बीच था, इसकी राहत महसूस कर रहा था।


Pratahkal-Suresh Goyal-Los Angeles
लॉस एंजलेस : इतना बड़ा शहर है सोच कर मुझे लग रहा था कि स्टेशन बहुत बड़ा होगा एसा कोई आभास नहीं हुआ। वही छोटे से प्लेटफार्म पर हमें उतारा गया। सामान कहाँ से लेना है इसकी बराबर घोषणा हो रही थी। प्लेटफार्म से निकल कर उसी दिशा में बढ़ा तो सामने से मुनीश नजर आ गया। उसे देखकर मन प्रसन्न हो या चार दिनों की यात्रा अकेले कर लेने के बाद मैं पुनः अपनों के बीच था, इसकी राहत महसूस कर रहा था।
बाहर निकलने के बाद स्टेशन की विशालता अनुभव कर रहा था। यहीं से स्थानीय मेट्रो ट्रेन का भी संचालन होता था इस कारण जबर्दस्त भीड़ और गहमा गहमी थी। सामान लेने के लिये हवाई अड्डों की तरह का ही केरूसल बेल्ट बना हुआ था। यहां काफी देर इन्तजार किया मगर बेल्ट शुरू होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अन्ततः सामान आया। मैंने अपनी अटेचियों पर लच्छे बांध रखे थे इसलिये आसानी से पहचान हो जाती थी। अटेचिया उठा कर बाहर जाने लगे तो दरवाजे पर ग बताने को कहा गया। मैंने अपनी जेबें संभाली तो टेग मिले ही नहीं। शिकागो के पूछताछ काउन्टर पर बताने के बाद कहा रखे इसका ध्यान नहीं रहा। सब तरफ ढा मगर कहीं नहीं मिले। हमें एक तरफ खड़े होने को कह अन्य लोगों को जाने दिया गया तो मेरे होश उड़ गये, अब क्या होगा। मुनीश साथ था इसलिये कोई न कोई रास्ता तो निकलेगा, यह सोचकर वापस शांति से ढूंढे मगर नहीं मिले। मुनीश ने पूछा- आपका टिकिट कहां है, टिकिट मैंने पासपोर्ट में रखा था, वो निकालने लगा तो अन्दर से दोनों टेग निकल कर नीचे गिर गये। टेग मैंने कब पासपोर्ट में रख दिये थे ध्यान ही नहीं रहा।
एक अटेची मैंने ली और एक मुनीश ने दोनों बेलते हुए बाहर निकले। यहां ट्रोलियां भी थी मगर उनका 6 डोलर देने का कोई तुक नहीं था। पार्किंग भी बहुत बड़ी थी, गर्मी जबर्दस्त पड़ रही थी, कार दूर पार्क थी, वहां तक पहुँचने में भी पसीने आ गये। मैं आदत के अनुसार कार की दायीं तरफ बढ़ने लगा तो मुनीश ने हंसते हुए कहा यहां भारत की तरह लेफ्ट हेन्ड ड्राइव नहीं है। दायीं तरफ ड्राइवर की सीट होती है। मैं घूम कर बायीं तरफ गया और अन्दर बैठा। न्यूयार्क में भी बार बार यही समस्या आती थी।
ए.सी. ओन कर दिया तो थोड़ी राहत की सांस ली। मुनीश कार स्टार्ट नहीं कर रहा था तो मैंने सोचा किसी का इन्तजार कर रहा है, मैंने उसकी तरफ देखा उसने आंखों से मेरे नीचे की तरफ इशारा किया, में कुछ समझा नहीं तो उसने •सीट बेल्ट। हमारे यहां तो मुम्बई
(Mumbai)
जैसे शहरों में भी सीट बेल्ट पर इतनी सक्ती नहीं है, जयपुर (Jaipur) में जरूर है, उदयपुर (Udaipur) में तो बिल्कुल भी नहीं। यहां पर बैठने वालों को भी सीट बेल्ट लगाना जरूरी होता है। छोटा बच्चा है तो उ गोदी में नहीं ले सकते, उसके लिये चाइल्ड बेल्ट अलग से आती है जो पिछली सीट पर ही फिट हो जाती है, इसमें भी निश्चित उम्र तक के बच्चों को उस चाइल्ड सीट में सीट की तरफ ही मुंह रख कर बिठाना पड़ता है, बच्चों को यह बहुत अटपटा लगता है मगर जरूरी है। कुछ वर्षों बाद जरूर बच्चों को इस सीट के सामने की तरफ मुँह रख कर बिठाने की इजाजत होती है, जब बच्चा इस उम्र तक पहुँचता है तो उसे एक तरह की आजादी मिल जाती है।
मैने बेल्ट लगाया तब उसने गाड़ी शुरू की। बाहर निकलते दोपहर की बर गई थी, घर घन्टे डेड घन्टे और दूर था ऐसे में खाना यहीं कहीं इण्डियन रेस्टॉरेन्ट में खा लेने की सोची। मैं भी पूड़ियां खा खा कर उब गया था इसलिये स्वाद परिवर्तन का इच्छुक था। स्टेशन होलीवुड के आसपास ही है। शहर की सबसे महगी कोलोनी बेवरली हिल्स यहीं थी। यहां कई प्रसिद्ध होलीवुड सितारों के मकान थे। मुनीश ने पूछा किसी सितारे का मकान देखना है क्या तो मैंने मना कर दिया। मुम्बई मैं हमारे मकान के आसपास कई नामी गिरामी सितारों के मकान हैं। हमारी बिल्डि में भी कई फिल्मी व टी.वी. कलाकार रहते हैं जिनसे रोज हाय-हल्लो होता है, इसलिये इनका कोई क्रेज नहीं था। अमिताभ बच्चन का मकान भी हमारे घर के पास ही था। हमारे आफिस की बिल्डिंग में भी कई रिकार्डिंग स्टूडियो व फिल्म प्रोडक्शनों के दफ्तर है, जहां आये दिन कलाकार आते रहते हैं। लिफ्ट में कोई न कोई टकराता ही रहता है।
मजे की बात यह थी कि यहां होलीवुड सितारों का घर दिखाने हेतु एक गाईडेड टूर चलता है जिसमें एक एक सितारे के घर के बाहर से गुजरते हुए गाईड उस सितारे का नाम बताता है और लोग इन घरों के बाहर खड़े होकर खुशी खुशी अपने फोटू खिंचाते हैं।
Editorial

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