✕
Home>
बफेलो 1 : न्यूयार्क में भयंकर आंधी-तूफान बफेलो एयरपोर्ट पर पड़े
By EditorialPublished on 19 May 2023 5:30 AM IST
शाम होने को आई तो हम एयरपोर्ट की तरफ निकल पड़े। किराये की जमा कराने के पहले उसमें फुल टंकी पेट्रोल भराया और उसके गेराज में पहुंच वहां कोई पूछताछ नहीं, कोई जांच पड़ताल नहीं, एक लड़की ने अपने हाथ के से गाड़ी के आगे क्लिक किया और बोली ओ. के. हम अपना सामान ले एयरपोर्ट 1 (Airport) घुस गये।

x

शाम होने को आई तो हम एयरपोर्ट की तरफ निकल पड़े। किराये की जमा कराने के पहले उसमें फुल टंकी पेट्रोल भराया और उसके गेराज में पहुंच वहां कोई पूछताछ नहीं, कोई जांच पड़ताल नहीं, एक लड़की ने अपने हाथ के से गाड़ी के आगे क्लिक किया और बोली ओ. के. हम अपना सामान ले एयरपोर्ट 1 (Airport) घुस गये।
हमारी फ्लाईट (Flight) में अभी देरी थी मगर सोचा थोड़ी देर वहीं बैठेंगे। वहां ए भारतीय परिवार (Indian family) से भेंट हो गई। ये लोग भारत लौट रहे थे मगर इनकी फ्लाईट केन्सल हो गई थी, इस कारण आगे की कनेक्टिंग फ्लाईट चूक जाने के आसार थे। मेरे पास एक प्रौढ महिला बैठी यही चिन्ता कर रही थी। ये हैदराबाद से अपन दोहिती की शादी में भाग लेने यहां आई थी लड़की बरसों से अपने पति के अमेरिका में है। दोहिती पैदा भी यहीं हुई और पली-बढी भी यहीं । उसने यहां एक अमरीकी से शादी की थी। उसी समारोह में भाग लेने नानी आई थी।
अमेरिका (America) आये भारतीयों की दूसरी पीढ़ी के लिये आजकल यह समस्या आम हो गई है। उन्हें अपने लिये भारत (India) में पले बढ़े साथी की आवश्यकता नहीं होती। वे अपना साथी खुद यहाँ तलाश करते हैं। इस तलाश में कई बार तो भारतीय साथी मिल जाते हैं तो माता-पिता खुश हो जाते हैं पर जब यह तलाश किसी अमरीकी पर जाकर ठहर जाती है तो भी उन्हें मन मार कर स्वीकार करना ही पड़ता है। कुछ सालों पहले यह चलन जरूर था कि माता-पिता अपनी संतान के लिये भारत में साथी की तलाश करते थे मगर ऐसे सम्बन्धों में वर-वधू दोनों के पालन पोषण व नजरिये में भिन्नता से काफी दिक्कतें आती थीं।
भारत में तो लड़का-लड़की 20-25 साल के हो जाते हैं तो माता-पिता को इनके सम्बन्ध कराने की चिन्ता हो जाती हैं। अमरीकी भारतीय इस तरफ से निश्चिन्त है, उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं। औलाद खुद अपना साथी चुनती है, उन्हें सिर्फ इतनी चिन्ता होती हैं कि औलाद इतनी बड़ी हो गई है, अभी तक अपना साथी नहीं चुना है तब वे जरूर उनको पूछते हैं कि उनके लिये क्या वे कोई साथी तलाश करें।
यहां भी भारतीयों की एरेन्ज्ड मेरिजेस होती है और इसके लिये कई मैरिज ब्यूरो खुले हुए हैं, वेब साईट पर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। एक बात अच्छी यह हो गई है कि जात-पात का किसी तरह का बंधन नहीं है। लड़कियां गोरों से शादी करे या लड़का गौरी ले आये उसकी बजाय तो किसी भी जाति के भारतीय से हो तो सब खुश होते हैं।
इस बीच हमारी फ्लाईट भी केन्सल हो जाने की जानकारी मिली। अगली फ्लाईट दूसरे दिन दोपहर को उपलब्ध थी। हमारे लिये तो भयंकर मुसीबत खड़ी हो गई। रात कहां बीताएंगे, होटल में जाएंगे तो दो ढाइसौ डालर ठुक जाएंगे। एयरलाइन्स वाले से मिन्नतें की कि किसी तरह हमें दूसरी फ्लाईट में जगह दे दे। उसने हाथ खड़े कर दिये तो फिर हमने भी तेवर दिखाये उससे झूठ बोला कि मेरा अगले दिन न्यूयार्क से लास एंजलेस का रेल टिकट है, केन्सल हो गया तो सारा आगे का कार्यक्रम चौपट हो जायगा उसका सारा हर्जा खर्चा एयरलाइन्स को देना पड़ेगा। हम आज रात कहां रहेंगे ? एयर लाइन्स किसी बढिया होटल में हमारे रहने का इन्तजाम करे। राजा जोर जोर से बोलने लगा तो आसपास के तमाम लोगों की नजरें हमारी तरफ हो गई।एयरलाइन्स वाले एसी स्थिति से बचना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि अन्य लोगों को यह बात मालूम हो कि उनसे उनके ग्राहक असन्तुष्ट हैं। उसने हमें चुप कराया और आश्वासन दिया कि वह देखता है कि हमारे लिये क्या हो सकता है। इस बीच हमारी ही उड़ान का एक और यात्री आया तो उसे भी यही जवाब दिया, वो बिचारा सुनकर चुपचाप चला गया।
हम वापस उस भारतीय परिवार के पास आकर बैठ गये। हमें लड़ता देख उनके दामाद को भी जोश आया, वह भी उनकी एयर लाइन्स से गर्मा गर्म बहस करने लगा। फ्लाईटें कई रद्द हो रही थीं, बता रहे थे कि न्यूयार्क में मौसम बहुत खराब है इस कारण कोई विमान उतर नहीं पा रहा है। जो लोग बफेलो के ही थे वे तो अपना सामान ले ले कर लौट रहे थे मगर मुसीबत हमारे जैसे पर्यटकों की ही थी।
थोड़ी देर इन्तजार के बाद वापस तलाश की तो हमें बताया गया कि रात की नौ बजे एक उड़ान है उसमें हमें जगह मिल सकती है मगर गारन्टी नहीं है। यह अजीब सा जवाब था। हमने पूछा गारन्टी का क्या मतलब? तो उसने बताया कि वह बोर्डिंग पास तो दे देगा, विमान हमें ले कर उड़ भी जायगा पर सीट नम्बर नहीं मिलेंगे। हमने कहा कोई बात नहीं, विमान जब तक हमें ले कर जाता है तब तक हम खड़े खड़े भी जाने को तैयार हैं, घन्टे भर की तो कुल फ्लाईट ही है। सीट नम्ब नहीं तो क्या, कोई न कोई सीट तो मिलेगी ही।
सामान चेक इन करा कर हाथ का सामान ले उड़ान के निर्धारित द्वार की तरफ अग्रसर हुए। यहां पहले से ही इस उड़ान में जाने वाले लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था। हम अचरज में पड़ गये कि उड़ान तो नौ बजे है, अभी से इतने लोग यह कैसे आ गये। किसी से पूछा तो पता चला कि यह लोग दोपहर चार बजे से यहां बैठे है। उड़ान 6 बजे की थी जो पहले 8 बजे हुई और अब 9 बजे हो गई है। न्यूयार्क में जबर्दस्त आंधी, तूफान और वर्षा चल रही है।
हमें यहां बैठने की जगह नहीं मिली तो आगे जाकर अगले द्वार की प्रतीक्षा सीटों पर जाकर बैठ गये। इस बीच एयरलाईन्स ने चार बजे से बैठे यात्रियों को बीस बीस डोलर के कूपन दे दिये। कूपन बोर्डिंग पास पर दिये जा रहे थे इसलिये हमें भी मिल गये। हम दोनों के बीच चालीस डालर हो गये, इसमें बहुत सामान आ जाता है। कूपन एक खास रेस्टोरेन्ट के थे, वहां जो मिलता था वही ले सकते थे। मेरे लायक तो आलू की फ्राइस, केक, पेस्ट्रीज कौराह और पेप्सी ही थी। 20 डोलर में जितना कुछ आया ले लिया।
राजा ने न्यूयार्क (New york) क्रिस को फोन कर दिया कि फ्लाईट रात को 10 बजे तक पहुँचेगी इसलिये वह हमें लेने साढ़े दस बजे तक तो पहुँच ही जाये। बात खतम ही हुई कि घोषणा हो गई कि न्यूयार्क का मौसम अभी तक साफ नहीं हुआ है. अब फ्लाईट साढे नो बजे जायगी। तुरन्त क्रिस को वापस फोन किया।
लोग सीटों पर पसरे हुए थे, कईयों ने अपना सामान ही सीटों पर रख दिया था। मैं समझता था यह बीमारी हमारे यहां ही है। अक्सर लोग एक सीट पर खुद बैठ जाते और अगली सीट पर अपना सामान रख देते, दूसरे यात्री भले ही अपने बैठने की जगह तलाशते रहें। यह आदत रेल व बस स्थानकों तक सीमित रहे तो समझ में आती है मगर हवाई जहाजों से यात्रा करने वाले लोग तो स्वयं को अभिजात्य वर्ग का मानते हैं, वे भी सीटों पर अपना सामान रख दें तो अचरज होता था।
अमेरिका जैसे अत्याधुनिक देश में भी लोगों को जब यही करते देखा तो लगा कि यह मानव स्वभाव की कमजोरी है। एक अनुकरणीय बात यहां देखने को मिली कि हर सीट के लिये, सीट के पिछवाड़े पर एक चार्जर लगा था। दिल्ली और मुम्बई जैसे अत्याधुनिक हवाई अड्डों पर भी यह सुविधा देखने को नहीं मिलती है। सीमित स्थानों पर चार्जर होते हैं, सब पर फोन लगे होते हैं और बाकी लोग इन्तजार करते रहते। नम्बर नहीं आता तो इधर उधर भटकते रहते।
लगभग सभी चार्जरों पर फोन लगे हुए थे। हमने तो अपने चार्जर अटेची में डाल दिये थे जो चेक इन हो गये थे। हमारे फोन की बैट्री भी कम होती जा रही थी। राजा के फोन की तो एकदम कम हो गई थी। इस बीच उड़ान का समय आधा घन्टा और बढ़ा दिया गया। हमारे यहां सर्दी के दिनों में कोहरे के कारण जब उड़ानें रद्द हो जाती हैं या विलम्बित हो जाती है तो कितना हा हा कार मचता है मानों इसमें भी सरकार का ही दोष हो मगर यहां भी यही स्थिति देखते हैं तो वास्तविकता का एहसास होता है। राजा किसी से चार्जर मांग कर ले आया। बारी बारी से दोनों ने उस पर अपने फोनों में जान डाल दी।

Editorial
Next Story
Related News
X
