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टोरन्टो 1. भारतवंशियों की बढती संख्या से पनपते लिटिल इण्डिया
By EditorialPublished on 28 April 2023 5:30 AM IST
कनाडा की सड़कों पर चलते हुए यह एहसास हुआ कि यहां के लोग ट्राफिक के प्रति उतने अनुशासित नहीं है जितने अमरीकी होते हैं फिर भी एक बात उल्लेखनीय रही, लोग जरूरत से ज्यादा सहयोगी निकले। कई बार हम रास्ता भूल जाते और किसी से पूछते तो वह पूरी दिलचस्पी लेकर हमें रास्ता बताता। एक जगह हम इसी तरह गाड़ी खड़ी करके रूक गये और इधर उधर देखने लगे तो एक गाड़ी हमारे पास आकर रूकी, उसमें से एक व्यक्ति निकला और हमसे पूछा कि क्या हमें किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता है। हमने उसे धन्यवाद दिया और कहा कि हम ऐसे ही खड़े हैं।

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कनाडा की सड़कों पर चलते हुए यह एहसास हुआ कि यहां के लोग ट्राफिक के प्रति उतने अनुशासित नहीं है जितने अमरीकी होते हैं फिर भी एक बात उल्लेखनीय रही, लोग जरूरत से ज्यादा सहयोगी निकले। कई बार हम रास्ता भूल जाते और किसी से पूछते तो वह पूरी दिलचस्पी लेकर हमें रास्ता बताता। एक जगह हम इसी तरह गाड़ी खड़ी करके रूक गये और इधर उधर देखने लगे तो एक गाड़ी हमारे पास आकर रूकी, उसमें से एक व्यक्ति निकला और हमसे पूछा कि क्या हमें किसी प्रकार की मदद की आवश्यकता है। हमने उसे धन्यवाद दिया और कहा कि हम ऐसे ही खड़े हैं।
इतनी अच्छी सड़कें फिर भी कहीं टोल का नामों निशां नहीं। हमने टोल फ्री इजी वे तो खरीद लिया था मगर अभी तक सिर्फ एक नाका ही आया था। हमारे यहां जिस तरह हर डेढ दो सौ कि.मी. पर टोल वसूला जाता है वह सरासर लूट के अलावा कुछ नहीं। इन नाकों पर वाहनों की लम्बी लम्बी कतारों से जिस कदर पेट्रोल डीजल की बरबादी और लोगों के वक्त की हानि होती है वह वसूले गये टोल से कहीं अधिक होती है। सरकार टोल नहीं हटाए तो कम से कम इजी वे जैसी कोई सुविधा तो करे जिससे वाहन निर्बाध गति से आगे बढ़ें।
शीघ्र ही हम टोरन्टो के डाउन टाउन इलाके में थे। ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के बीच चौड़ी चौड़ी सड़कें भी पतली पतली गलियों सी प्रतीत हो रही थी। टोरन्टो का सी. एन. टावर विश्व प्रसिद्ध है, हम उधर ही जा रहे थे मगर रास्ते में ही जेरार्ड स्ट्रीट पड़ती है जिसे टोरन्टो का लिटिल इण्डिया या लघु भारत कहा जाता है। इसे कई लोग जेरार्ड इण्डिया बाजार के नाम से भी पुकारते हैं। यहां भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी, अफगान, श्रीलंकाई रेस्टोरेन्ट, दुकानें प्रचुरता से दिखाई देती हैं। यहां के साईन बोर्ड पढ़ें तो एक क्षण के लिये तो एसा लगता है जैसे भारत के ही किसी बाजार में पहुँच गये हों।
अमेरिका व कनाडा में जिस तरह भारतवंशियों की संख्या बढ़ती जा रही है उस कारण इन देशों के कई शहरों में इस तरह के छोटे-बड़े लिटिल इण्डिया पनपने लगे हैं। हालांकि जेरार्ड स्ट्रीट में भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की कोई बस्ती नहीं है मगर पूरे टोरन्टो में दूर दूर तक रहने वाले भारतवंशी यहां आकर अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इस बाजार में दीपावली ईद व सिखों के धूमधाम से मनाये जाते हैं। दीपावली व ईद का संयुक्त उत्सव भी बाजार के व्यापा मिलकर मनाते हैं। यहीं एक सिनेमाघर भी है जहां सिर्फ भारतीय फिल्में ही प्रदर्शि की जाती है।
वास्तव में इस सिनेमा की वजह से ही यहां भारतीय बाजार धीरे धीरे पनप इसका सारा श्रेय पंजाब के एक इन्जिनियर ज्ञान चन्द नाज को जाता है जो 196 के दशक के उत्तरार्ध में कनाडा आये। इन्होंने यहां एक चर्च के तलघर में 1 एम.एम. की भारतीय फिल्में दिखानी शुरू की। हर 40 मिनट बाद रीलों को पलटन पहता था और बहुत व्यवधान उपस्थित होता था फिर भी अपने देश से इतनी रह रहे लोगों को अपनी फिल्में देखने को मिलती तो वे बहुत धैर्य से देखते थे।
नाज की तमन्ना थी कि किसी तरह एक सिनेमाघर लिया जाये जिस भारतीय फिल्में दिखाई जायें। उनकी वित्तिय हालत एसी नहीं थी इसलिये उन्हों पार्टनरों हेतु कई द्वार खटखटाये मगर उन्हें सफलता नहीं मिली। इसी बीच जेरा स्ट्रीट का ईस्टवुड सिनेमा बन्द हो गया। नाज ने यह सिनेमा किराये ले लिया औ समूचे उत्तरी अमेरिका के इतिहास में पहली बार एक 35 एम.एम. की भारती फिल्म इस सिनेमा में रिलिज की। नाज की पत्नी शोभा खुद टिकिट बेचती औ उनके बच्चे मन्दिरों व गुरुद्वारों में पेम्फलेट बांटते। लोग सिनेमा देखने आते मग खर्चा पूरा नहीं होता, इसके बावजूद नाज ने हिम्मत नहीं हारी और डटे रहे।
धीरे धीरे दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और 1974 की एक सुबह नाज न दस हजार डालर में सिनेमा खरीद कर इसका नाम नाज थियेटर रख दिया।
सिनेमा देखने आने वाले भारतीय समुदाय के कारण यहां धीरे धीरे भारतीय वस्तुओं की दुकानें खुलने लगी, यहां तक कि एक पान की दुकान भी खुल गई कनाडा में नाज सिनेमा की सफलता के बाद अमेरिका के कई शहरों में भी नाज सिनेमा खुल गये जिनमें सिर्फ भारतीय फिल्में ही दिखाई जाती हैं। आज हालत यह है कि बड़े से बड़े मल्टी प्लेक्सों में भारतीय फिल्में दिखाई जाती हैं।
जेरार्ड स्ट्रीट के बाद हम सी. एन. टावर की तरफ अग्रसर हुए। टावर का शिखर दूर से ही दिखाई दे रहा था मगर व्यस्त इलाके में स्थित होने के कारण इसका सही स्थान हमें पता नहीं चल पा रहा था। क्षेत्र में जगह जगह एक तरफा यातायात होने के कारण इसे ढूंढने में पसीने आ गये। मैं सोच सोच कर हैरान था कि
जिस स्थान की कीर्ति पूरी दुनिया में फैली है उसे ऐसे घने इलाके में बनाने की क्या आवश्यकता थी।
हम इधर उधर घूमते रहे, टावर नजर आता रहा मगर सही स्थान का पता नहीं चला। अन्ततः हमने गाड़ी एक जगह पार्क की, हमारी खुश किस्मती थी जो पार्किंग में जगह मिल गई वरना गाड़ी में ही भटकते रहते। जिस स्थान को देखने दुनिया भर से पर्यटक आते हैं वहां पार्किंग की समुचित व्यवस्था नहीं होना भी आश्चर्य की बात थी। गाड़ी पार्क कर हम पैदल ही टावर की तलाश में निकल पड़े। थोड़ा चले तो आखिर हम सही ठिकाने पहुँच ही गये। यहां भी एसा नहीं लग रहा था कि यही सी. एन. टावर है, लोगों ने बताया तो हम कुछ सीढीयां चढ कर उपर पहुँचे
तो तसल्ली हुई कि हम सही स्थान पर पहुँच गये हैं।
सी. एन. टावर अर्थात केनेडियन नेशनल टावर 1854 फीट ऊंचा पर्यवेक्षण टावर है जो 1974 में बना और 34 साल तक विश्व का सबसे ऊंचा टावर तथा विश्व का सबसे ऊंचा खड़ा ढांचा रहा। 2010 में बुर्ज खलीफा तथा केन्टन टावर ने यह खिताब इससे छीन लिया। अब यह विश्व का तीसरा सबसे ऊंचा टावर है। यह टावर एक तरह से कनाडा का प्रतीक चिन्ह बन गया है जो प्रति वर्ष 20 लाख से ज्यादा पर्यटक आकर्षित करता है।
यहां भी उपर जाने का भारी टिकिट था। टिकिट खिड़की पर ही हमें बता दिया गया कि अभी टिकिट लोगे तो डेढ घन्टे की इन्तजारी के बाद उपर जाने को मिलेगा। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। टिकिट लेकर हम एक जगह बैठ गये और डेव घन्टा कैसे व्यतीत करना है यह सोचने लगे, तभी हमें किसी ने टोक दिया कि यहां बैठने की इजाजत नहीं है। हमने उसे बताया कि हमें डेढ घन्टे इन्तजार करने को कहा गया है तो कहां करें तो उसने स्पष्ट किया कि डेढ घन्टे इन्तजार कहीं बैठ कर नहीं करना है वरन अभी आप अगर लाईन में लगोगे तो कम से कम डेढ़ घन्टे बाद आपका उपर जाने का नम्बर आयगा ।
हमने यहां काफी देर बैठ कर फिजूल में ही वक्त बर्बाद कर दिया था। जल्दी से उस जगह पहुँचे जहां लाईन लगी हुई थी।

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