थोड़ी देर में जोएल भी आ गई उसे देखते ही मैं पहचान गया। अब बूढी लगने लगी थी, वह भी मुझे पहचान गई और गाल से गाल मिला अभिवादन किया। वह अपनी भारत यात्रा को याद करने लगी। बार बार लीला बाईजी को याद करते हुए अफसोस जताया। इस बीच डगलस भी अपनी मंगेतर के साथ आ गया। उसे दवाई का पेकेट दिया तो उसने बहुत बहुत धन्यवाद दिया। इस बीच उसकी मां ने ईशारा किया कि वह मुझे पैसे दे। उसने पर्स खोल कर सौ-सौ डालर के नोट निकाले और मुझसे पूछा कि कितने देने हैं। मैंने साफ इन्कार कर दिया कि जिनके जरिये दवाएं आई हैं उन्होंने भी पैसे नहीं लि


Suresh goyal
Editorial

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