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वेन्कूवर 01 : मुद्रा की अप्रासंगिकता की युग परिवर्तनकारी घटना के दर्शन
By EditorialPublished on 17 Oct 2023 5:30 AM IST
वेन्कूवर Vancouver : सामने ही इमीग्रेशन की तीन चार लाइनें लगी हुई थीं। हमें भी इसी में लगना था। हमने कनाडा से अमेरिका में प्रवेश किया था इस कारण इमीग्रेशन हो रहा था। सबने अपना अपना सामान उठाया और लाईन में लगने लगे। राजा अपनी अटेची उठाने लगा तो उसका हेन्डल गायब था, रात को जब कमरे से बाहर रखी थी तब तो ठीक थी, उसके पश्चात ही हेण्डल टूटा था। अटेची बहुत सुन्दर और प्यारी थी, महज हेन्डल टूट जाने से एकदम बेकार हो गई थी। राजा बहुत शौक से इसे होंगकोंग से खरीद कर लाया था। लापरवाही सरासर जहाज के स्टाफ की थी. उनसे इसका

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वेन्कूवर Vancouver : सामने ही इमीग्रेशन की तीन चार लाइनें लगी हुई थीं। हमें भी इसी में लगना था। हमने कनाडा से अमेरिका में प्रवेश किया था इस कारण इमीग्रेशन हो रहा था। सबने अपना अपना सामान उठाया और लाईन में लगने लगे। राजा अपनी अटेची उठाने लगा तो उसका हेन्डल गायब था, रात को जब कमरे से बाहर रखी थी तब तो ठीक थी, उसके पश्चात ही हेण्डल टूटा था। अटेची बहुत सुन्दर और प्यारी थी, महज हेन्डल टूट जाने से एकदम बेकार हो गई थी। राजा बहुत शौक से इसे होंगकोंग से खरीद कर लाया था। लापरवाही सरासर जहाज के स्टाफ की थी. उनसे इसका मुआवजा वसूला जाना चाहिये, सभी की यही इच्छा थी। मुनीश- प्रीति को तो लोस एंजलेस की उड़ान पकड़नी थी, इसलिये उन्हें तो निकलने की जल्दी थी, मेरी यहां के मामलों की कोई खास समझ नहीं थी, राजा जो हो गया सो हो गया में विश्वास करता था, ऐसे में लड़ाई कौन करे। राजा को दुःख तो बहुत हुआ पर मन मसोस कर हम इमीग्रेशन की लाईन में लगे। बहुत क्रूज कम्पनियों का क्या नियम है पता नहीं मगर एयर लाइन्स में जरूर एक हफ्ते के भीतर भीतर बेगेज टूटने के मुआवजे का दावा किया जा सकता है। राजा वापस न्यूयार्क लौट कर भी चाहे तो केस कर सकता था। 1997 में मैं यूरोप के टूर में गया था। हमारे साथ कई अन्य भारतीय थे, यात्रा के दौरान एक यात्री की बी.आई.पी. अटेची का हेन्डल भी इसी तरह टूट गया था. हम किसी एयरलाईन्स से यात्रा कर रहे थे, उसने हंगामा मचा दिया। एयरपोर्ट पर स्थित सभी यात्री उस एयरलाईन्स के काउन्टर की तरफ देखने लगे। सभी एयरलाइन्स अपने खिलाफ इस तरह के आक्रोश के जन प्रदर्शन से डरती हैं. वे नहीं चाहती कि अन्य यात्रियों में उनकी छवि तिरोहित हो एयरलाइन्स वालों ने तत्काल उस उद्वेलित यात्री को शांत किया और 600 डालर नकद देकर मामला निपटाया। उस अटेची की कीमत इससे आधी भी नहीं रही होगी। तब डालर 36 रू. का था।
वैसे क्रूज लाइन वाले एयर लाइन्स की तरह उदार नहीं होते क्यूंकि उनके इतने अधिक ग्राहक होते ही नहीं है इसलिये इन्हें अपनी छवि की वैसी चिन्ता नहीं होती। राजा की अटेची का तो सिर्फ हेन्डल टूटा था, एक बार किसी यात्री ने इसी तरह रात को कमरे के बाहर अपनी अटेची रखी थी, सुबह जहां सब लोगों की अधियां रखी हुई थी यहां उसकी अटेची मिली ही नहीं। अटेची गायब हो गई। यात्री।। मेज लाइन से 2100 डालर का मुआवजा मांगा। इतना सामान उसकी अटैची में था जिसमे कुछ गहने भी थे। क्रूज ने इतना पैसा देने से साफ इन्कार कर दिया और महज 250 डालर देने की पेशकश की। यात्री को उल्टी डांट अलग पिलाई कि आपने अटेची का इन्श्योरेन्स क्यू नहीं कराया। पूरी अटेची के 250 तो हेन्डल टूटने के कितने मिलते। हम सब भूल भाल कर बाहर निकले।
बाहर उसी पार्किंग स्थल में पहुँच गये जहां एक सप्ताह पूर्व मयंक हमें छोड़ गया था। यहां ट्राफिक पुलिस टेक्सियों को निर्देशित कर रहे थे। तमाम यात्री अपने अपने सामान के साथ खड़े थे, पुलिस वाला सिटी बजाकर टेक्सी को बुलाता और सबसे आगे के यात्रियों को भर कर टेक्सी आगे बढ़ जाती। मुनीश और हम साथ ही खड़े थे। मुनीश के पास सामान ज्यादा था, मैंने अपना अधिकांश सामान भी उसे ही दे दिया था क्यूंकि 3 दिन बाद वापस में उसके पास ही जाने वाला था।
मुनीश ने पुलिस वाले से कहा कि उसे बड़ी टेक्सी चाहियेगी क्यूंकि सामान ज्यादा है। एस.यू.वी. जैसी बड़ी टेक्सियां भी वहां खड़ी थी। उसने सिटी बजाकर एक बुलाई। सामान भर कर दोनों पति पत्नी ने हमसे विदा ली, खास कर के राजा से। इनके जाने के बाद हम भी एक टेक्सी में बैठ गये। एयरपोर्ट से लगती हुई ही कार रेन्टल की बहुत बड़ी बिल्डिंग थी। हमारा टेक्सी ड्राइवर कोई कोरियन प्रतीत होता था। महीने भर पहले बफेलो से जब कार ले कर हम कनाडा गये थे तो मेरे कार्ड से कार बुक कराई थी मगर अन्तिम समय में मेरे कार्ड पर उसने कार देने से इन्कार कर दिया था क्यूंकि मेरा केश कार्ड था, क्रेडिट कार्ड नहीं तब राजा ने अपनी पत्नी के कार्ड से भुगतान किया था। आज भी वही समस्या आने वाली थी, मेरे कार्ड में हजार- बारा सो डोलर थे मगर वो निरर्थक थे। राजा ने अपने कार्ड में पैसे ट्रांसफर कर दिये थे मगर शनिवार-रविवार के कारण पैसे कार्ड में आये कि नहीं पता नहीं था।
हम लोगों को देनकूवर जाना था। सीवेटल से वहां के लिये हर घन्टे बसें चलती थी, ट्रेन सर्विस भी अच्छी थी, मैंने उससे यही कहा कि छोड़ो कार वार का झंझट, अपन बस से चलते हैं. पैसे भी कम लगेंगे मगर उसे तो कार चलाने में मजा आता था। यह ऐसा कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता था। शीघ्र ही हम लोग कार रेन्टल की शानदार बिल्डिंग के बाहर पहुँच गये। राजा ने टेक्सी ड्राइवर को कुछ देर रुकने को कहा क्यूंकि अगर उसके कार्ड में पैसे नहीं आये तो जमा कराने पड़ेंगे। टेक्सी वाला मान गया।
यह छः सात मंजिल की अत्यन्त भव्य इमारत थी। पहली नजर में तो यही लगता था जैसे किसी एयरपोर्ट का शानदार टर्मिनल हो। यहां एक साथ कई कार रेन्टल कम्पनियों के एक के बाद एक शो रूम बने हुए थे। बफेलो में तो एक कमरे में इन कम्पनियों के काउन्टर थे पर यहां सबके अलग अलग कक्ष थे जिनमें सोफे, टेबल, कुर्सियां लगे हुए थे। शो रूम के सामने बहुत चौड़ा गलियारा था जिसमें यात्री प्रतीक्षा कर सकते थे। मैं इसी जगह सारा सामान लेकर बैठ गया। मेरे पास ही एक गुजराती परिवार बैठा था।
राजा एविस के काउन्टर पर लाईन में खड़ा हो गया। मैंने अपना कार्ड भी उसे दे दिया था। रविवार था इसलिये भीड़ ज्यादा थी। राजा का क्रम आया तो वही हुआ जिसकी आशंका थी, उसके कार्ड में पैसे ट्रांसफर नहीं हुए थे और एविस वाले नकद लेने को तैयार नहीं थे। उन्होंने पास ही स्थित एक बैंक बताया जहां पैसे जमा करा दो तो कार्ड में आ जायेंगे। राजा जल्दी जल्दी मेरे पास आया और बोला कि वो टेक्सी वाला है कि गया। समय बहुत निकल गया था, बिचारा टेक्सी वाला रूका थोड़े ही होगा, मैंने बाहर आकर देखा तो वह जा चुका था।
राजा परेशान हो गया, आसपास कोई टेक्सी भी नजर नहीं आ रही थी। मैं सोच सोच कर हैरान था. अपनी आंखों के सामने बहुत बड़ा युग परिवर्तन होते देख रहा था। वस्तुओं के आदान प्रदान की बार्टर प्रणाली के बाद मुद्रा के अविर्भाव से पूरी दुनिया में मुद्रा ने जो शक्ति अर्जित की थी आज उसके धूल धूसरित होने का मैं खुद भुगत भोगी था। जिस मुद्रा ने बड़ी बड़ी लड़ाईयां करवाई, साम्राज्य बदल दिये आज उसका यह हश्र हो गया कि हरे हरे नोट दिखाने के बावजूद उसकी कोई कीमत नहीं।
राजा के पास एक टेक्सी कम्पनी का नम्बर था, उसने फोन कर टेक्सी बुलवाई। उसे आने में ही काफी समय लग गया ज्यू ज्यू वक्त गुजरता जा रहा था उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। अन्ततः टेक्सी आ गई, वह जाने लगा तो मैंने पूछ लिया पैसे तो नहीं चाहिये उसने कहा हैं उसके पास, इसके बाद वह तेजी से - निकल गया।
हम लोग सुबह जल्दी ही जहाज से उतर गये थे, उस वक्त तो कुछ खास खाया नहीं, अब जरूर भूख लगने लगी। मेरे पास बैठे गुजराती परिवार ने इस बीच अपने डिब्बे खोल लिये थे और वे खाखरा आचार वगैरा खा रहे थे। आचार की गन्ध सीधे मेरे पेट पर हमला कर भूख और बढा रही थी। मैं हसरत भरी निगाहों से इन लोगों की तरफ देखने लगा, सोच लिया था कि ये अगर कुछ पेशकश करेंगे तो मैं इन्कार नहीं करूंगा। उन्हें तो मेरी उपस्थिति तक का एहसास नहीं था। मेरे मन में आया कि इनसे कुछ मांग लू - मगर मेरे दूसरे मन ने ही मुझे धिक्कार दिया कि मंगता है क्या। इस बीच राजा को गये जब काफी वक्त हो गया तो मैं चिन्ता करने लगा। बार बार यही सोच रहा था - कहां कार के झंझट में पड़ रहे हैं, इससे तो अच्छा बस ले लेते। तभी तेज कदमों से आते हुए राजा को देख जान में जान आई। उसकी प्रसन्नता से ही पता चल गया कि काम हो गया है।
वह वापस एविस के काउन्टर पर गया। जिस क्लर्क से उसने बात की थी वह बदल गया था, इसलिये वापस लाईन में लगना पड़ा। थोड़ी ही देर में उसकी बारी आ गई। उसके कार्ड में पैसे आ गये थे। गाड़ी आसानी से मिल गई।

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