NEET-PG 2025-26 की तीसरे चरण की काउंसलिंग में 800 में से 1 अंक पाने वाले अभ्यर्थी को हैदराबाद में एमएस ऑर्थोपेडिक्स सीट मिलने से देशभर में बहस तेज हो गई है। कट-ऑफ प्रतिशतांक में ऐतिहासिक गिरावट के बाद कम अंकों पर पीजी सीट आवंटन ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली चिकित्सा प्रवेश परीक्षाओं में से एक—NEET-PG—एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार कारण कोई टॉपर नहीं, बल्कि एक ऐसा अभ्यर्थी है जिसने 800 में से मात्र 1 अंक हासिल किया और इसके बावजूद उसे एमएस ऑर्थोपेडिक्स जैसी सर्जिकल विशेषज्ञता में प्रवेश मिल गया। यह मामला केवल एक सीट का नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठते बड़े सवालों का संकेत बन गया है।


तीसरे चरण की काउंसलिंग में चौंकाने वाला आवंटन:

शैक्षणिक वर्ष 2025-26 की तीसरे चरण की राज्य कोटा काउंसलिंग के दौरान हैदराबाद के एक निजी मेडिकल कॉलेज में एमएस ऑर्थोपेडिक्स की सीट एक ऐसे उम्मीदवार को आवंटित की गई, जिसने NEET-PG परीक्षा में केवल 1 अंक प्राप्त किया था। इस उम्मीदवार की ऑल-इंडिया रैंक लगभग 2,29,981 बताई जा रही है—एक ऐसी रैंक जो सामान्य परिस्थितियों में किसी सर्जिकल शाखा में प्रवेश के लिए अत्यंत दूर मानी जाती है।


कट-ऑफ में अभूतपूर्व गिरावट:

इन आवंटनों के पीछे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय है। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBEMS) और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने NEET-PG 2025-26 के लिए योग्यता निर्धारित करने वाले प्रतिशतांक (कट-ऑफ) में भारी कमी की। इसका उद्देश्य देशभर में बड़ी संख्या में खाली रह जाने वाली पीजी सीटों को भरना बताया गया।

कट-ऑफ में किए गए प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं:

  • सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ 50वें प्रतिशतांक से घटाकर 7वें प्रतिशतांक तक लाया गया।
  • आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के लिए इसे और घटाकर 0वें प्रतिशतांक तक निर्धारित किया गया।

इस बदलाव का अर्थ यह हुआ कि अत्यंत कम, यहाँ तक कि नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी भी काउंसलिंग प्रक्रिया के लिए पात्र हो गए।


राष्ट्रीय स्तर पर दिखा व्यापक प्रभाव:

काउंसलिंग के आंकड़े बताते हैं कि केवल तेलंगाना ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में भी क्लिनिकल और सर्जिकल शाखाओं—जैसे ऑर्थोपेडिक्स—में एकल अंक या अत्यंत कम अंकों वाले अभ्यर्थियों को प्रवेश मिला है। यह प्रवृत्ति चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में एक बड़े नीतिगत परिवर्तन की ओर संकेत करती है। डॉक्टरों के संगठनों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि इस प्रकार की पात्रता शिथिलता से स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण के मानकों पर प्रभाव पड़ सकता है और दीर्घकाल में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ने की आशंका है।


नीति और गुणवत्ता के बीच संतुलन का प्रश्न:

सरकार का तर्क है कि हजारों सीटें खाली रह जाने से संसाधनों की बर्बादी होती है और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी रहती है। दूसरी ओर, चिकित्सा समुदाय के एक वर्ग का मानना है कि न्यूनतम योग्यता मानकों में इतनी बड़ी छूट से चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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