भारत में शिक्षा ऋण की पहुंच कम होने और कुल ऋण राशि दोगुनी होने का संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है. रिपोर्ट में Digvijaya Singh की अध्यक्षता वाली समिति ने शिक्षा ऋण में गिरावट, ग्रामीण छात्रों के लिये कठिनाई और शिक्षा ऋण सुधार की सिफारिशों पर प्रकाश डाला है.

नई दिल्ली: शिक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक चिंता ने संसद के पटल पर तीव्र बहस को जन्म दे दिया है, क्योंकि संसदीय स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट में शिक्षा ऋण की पहुंच में गिरावट और कुल छात्र ऋण में पिछले दशक में दोगुनी वृद्धि के तथ्य उजागर किये गये हैं. इस रिपोर्ट को संसदीय स्थायी समिति (Standing Committee on Education, Women, Children, Youth and Sports) ने डिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में प्रस्तुत किया, जिसमें विगत वर्षों में उच्च शिक्षा ऋण की प्रणाली के बढ़ते असंतुलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की गयी है.

समिति की 372वीं रिपोर्ट में उल्लेख है कि 2014 में सक्रिय शिक्षा ऋण लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 23.36 लाख थी, जो साल 2025 में घटकर केवल 20.63 लाख रह गयी है. वहीं वहीँ कुल ऋण राशि ₹52,327 करोड़ से बढ़कर ₹1,37,474 करोड़ तक पहुंच गयी है, जो स्पष्ट रूप से यह संकेत देती है कि कम संख्या में छात्र अब कहीं अधिक राशि के ऋण ले रहे हैं और शिक्षा की लागत लगातार बढ़ रही है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उच्च शिक्षा के बढ़ते खर्च और बैंकिंग लचीलेपन की कमी के कारण विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को शिक्षा ऋण लेने में कठिनाई हो रही है. समिति ने यह भी चेताया कि यह पैटर्न न केवल कर्ज के बोझ को बढ़ाता है, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा की पहुंच को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है.


समिति ने अपने निष्कर्षों में कहा है कि इस स्थिति को तत्काल सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि शिक्षा ऋण को “वित्तीय पहुँच में कमी और बढ़ती लागत के बीच बने विषम संतुलन की पहचान” के रूप में चिन्हित किया गया है. समिति ने यह सुझाव दिया कि शिक्षा ऋण को एक वाणिज्यिक उत्पाद के रूप में नहीं बल्कि एक सामाजिक कल्याण उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए, जिससे देश के युवाओं को मजबूत वित्तीय सहायता मिल सके.

विशेष रूप से, रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि उच्च शिक्षा विभाग (Department of Higher Education) और वित्तीय सेवाओं विभाग (Department of Financial Services) को मिलकर ऐसे कार्यक्रम विकसित करने चाहिए जो शिक्षा ऋण की पहुंच को अधिकतम छात्रों तक सुनिश्चित करें, विशेष रूप से Below Poverty Line (BPL) परिवारों को प्राथमिकता दी जाये. यह कदम शिक्षा प्रणाली में बढ़ती असमानता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है.

रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि moratorium अवधि को बढ़ाकर कोर्स पूरा होने के बाद दो वर्ष किया जाये, ताकि स्नातक युवा नौकरियां पाने के पहले ऋण भुगतान की आवश्यकता से बच सकें. इसके साथ ही, समिति ने कर्ज गारंटी को बढ़ाकर ₹20 लाख करने और सभी बैंकों के लिए समान ब्याज दर नीति लागू करने की मांग भी की है, जो शिक्षा ऋण को अधिक सहज और सुव्यवस्थित बना सके.

समिति की इन सिफारिशों से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा ऋण की बढ़ती लागत और घटती पहुंच न केवल छात्रों के निजी भविष्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि समाज की शिक्षा प्रणाली में व्यापक असंतुलता का संकेत भी दे रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुरंत सुधारात्मक कदम नहीं उठाये गये, तो हज़ारों युवाओं के उच्च शिक्षा के अवसर और भविष्य की योजनाएँ जोखिम में पड़ सकती हैं.

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