उमर खालिद के केस पर JNU में छात्रों का नारा-प्रदर्शन ; ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’ बयान ने मचाया हंगामा
जेएनयू में छात्रों ने मोदी और शाह के खिलाफ नारे लगाए, अदालत ने खालिद और इमाम की बेल खारिज की। प्रशासन ने सुरक्षा उल्लंघन का आरोप लगाया, भाजपा ने कार्रवाई की मांग की, जबकि जेएनयू छात्र संघ ने इसे सामान्य असंतोष बताया। घटना ने छात्र राजनीति और कानूनी तनाव को राष्ट्रीय स्तर पर उभारा।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रों द्वारा नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ नारे लगाने की घटना ने राजनीतिक और प्रशासनिक ध्यान आकर्षित किया है। यह प्रदर्शन उस समय हुआ जब अदालत ने 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े केस में प्रमुख आरोपियों—खालिद और इमाम—की बेल खारिज करते हुए पांच अन्य आरोपियों को बेल प्रदान की।
छात्रों ने न्यायिक निर्णय के विरोध में कैंपस में जोरदार नारे लगाए, जिनमें से एक प्रमुख नारा था, “मोदी-शाह की कब्र खुदेगी, जेएनयू की धरती पर।” इस नारे ने जेएनयू प्रशासन और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया। जेएनयू के चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर ने तत्काल पुलिस में नामजद छात्रों जैसे कि आदि मिश्रा और गोपिका बाबू के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया, यह आरोप लगाते हुए कि उनके कृत्य ने कैंपस आचार संहिता का उल्लंघन किया और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डाला।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज रही। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने छात्रों द्वारा लगाए गए नारे को 'अर्बन नक्सल' गतिविधि करार देते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। वहीं, जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) के अध्यक्ष ने कहा कि यह नारा अदालत के फैसले के खिलाफ सामान्य असंतोष की अभिव्यक्ति मात्र था और किसी व्यक्तिगत या हिंसक अभिप्राय को दर्शाने का उद्देश्य नहीं था।
वर्तमान में दिल्ली पुलिस ने इस मामले में किसी प्रकार की एफआईआर दर्ज नहीं की है, हालांकि प्रशासन ने स्थिति पर कड़ी निगरानी बनाए रखने की बात कही है। जेएनयू के अधिकारियों ने बताया कि कैंपस सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं, और छात्रों के गतिविधियों पर विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
कानूनी दृष्टिकोण से, अदालत के फैसले और छात्रों की प्रतिक्रिया के बीच का यह तनाव एक संवेदनशील मामला बन गया है। छात्रों के नारे राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आते हैं, लेकिन यदि यह सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बनता है तो प्रशासन के लिए कदम उठाना अपरिहार्य हो जाता है। इस घटना ने शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक असंतोष और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती को भी उजागर किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जेएनयू जैसी संस्थाओं में इस तरह के नारे न केवल प्रशासनिक सतर्कता बढ़ाते हैं, बल्कि राजनीतिक दलों और मीडिया के लिए भी चर्चा का केंद्र बन जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय परिसर में छात्र आंदोलनों और कानूनी प्रक्रियाओं का प्रभाव व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है।
इस घटना ने न केवल जेएनयू के भीतर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा को बढ़ा दिया है। छात्रों के विरोध ने यह सवाल खड़ा किया है कि न्यायिक निर्णय और उसकी प्रतिक्रिया के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। इसके साथ ही, यह मामला भारत में छात्र राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के दायरे के बीच की जटिलताओं को उजागर करता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
