युवराज मेहता केस: SIT की जांच में फंसी अथॉरिटी, इन्साफ के इंतज़ार में पिता ने देश छोड़ने का लिया फैसला
ग्रेटर नोएडा में 27 वर्षीय युवराज मेहता की कार एक गड्ढे में गिरने से मौत, पिता राजकुमार मेहता ने अस्थायी रूप से लंदन का रुख किया, जांच में देरी और सुरक्षा मानकों की कमी पर SIT द्वारा गहन जांच जारी है।

युवराज मेहता मृत्यु घटना
जनवरी की कड़कड़ाती ठंड और घने कोहरे की चादर के बीच जब पूरा शहर नींद के आगोश में था, तब ग्रेटर नोएडा की एक अधूरी सड़क पर मौत का जाल बिछा हुआ था। पेशावर से सॉफ्टवेयर इंजीनियर और सपनों से लबालब 27 वर्षीय युवराज मेहता को क्या पता था कि जिस रास्ते से वह रोज गुजरते हैं, वहीं एक असुरक्षित और जलमग्न निर्माण गड्ढा उनकी कब्र बन जाएगा। यह महज एक सड़क दुर्घटना नहीं है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने वाली व्यवस्था की वह कड़वी सच्चाई है, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को ताउम्र का दर्द दे दिया।
घटना के समय दृश्यता (visibility) शून्य के करीब थी। युवराज की कार अनियंत्रित होकर नहीं, बल्कि बिना किसी बैरिकेडिंग और चेतावनी बोर्ड के छोड़े गए एक गहरे, पानी से लबालब गड्ढे में जा गिरी। पानी के बीच फंसी कार में सांसे थम रही थीं, लेकिन हौसला बाकी था। युवराज ने डूबती कार के बीच से अपने पिता, राजकुमार मेहता को फोन किया। करीब दो घंटे तक वह फोन पर अपने पिता से मदद की गुहार लगाते रहे, जिंदगी की भीख मांगते रहे। दूसरी तरफ एक बेबस पिता अपने बेटे को बचाने के लिए प्रशासन की चौखट और रेस्क्यू टीमों की राह देखता रहा।
पुलिस, दमकल विभाग, SDRF और NDRF की टीमें मौके पर तो पहुंचीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दो घंटे तक मौत से लड़ने के बाद जब युवराज को बाहर निकाला गया, तो उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी। अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। एक पिता के कानों में आज भी अपने बेटे की वो आखिरी चीखें गूंज रही हैं, जो शायद समय पर सही संसाधनों के पहुंचने से बचाई जा सकती थीं।
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जांच के घेरे में 'रक्षक' और बिल्डर:
इस घटना ने स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है। SIT मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर अपनी जांच केंद्रित कर रही है:
- सुरक्षा खामियां: निर्माण स्थल पर अनिवार्य बैरिकेडिंग और रेडियम रिफ्लेक्टर क्यों नहीं लगाए गए थे?
- रेस्क्यू में देरी: पुलिस, SDRF और NDRF जैसी आधुनिक सुविधाओं से लैस टीमों के होने के बावजूद दो घंटे तक कोई ठोस परिणाम क्यों नहीं निकला?
- जवाबदेही: संबंधित डेवलपर्स और लापरवाह अधिकारियों की पहचान, जिनमें से कुछ की गिरफ्तारियां भी की गई हैं।
कानूनी दांव-पेंच और नौकरशाही की सुस्त रफ्तार ने पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
बेटे की मौत और उसके बाद न्याय के लिए भटकने की हताशा ने राजकुमार मेहता को अंदर से तोड़ दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वे अपनी बेटी के साथ लंदन चले गए हैं। पड़ोसियों और परिचितों का कहना है कि यह उनका स्थायी पलायन नहीं, बल्कि उस दुख से उबरने का एक प्रयास है जिसने उन्हें भारत में रहने पर सिर्फ अपने बेटे की तड़प और व्यवस्था की नाकामी याद दिलाई। हालांकि उन्होंने वापस लौटने की बात कही है, लेकिन उनका विदेश जाना देश की न्यायिक और राहत प्रणालियों के प्रति उनके गहरे असंतोष और आक्रोश का मौन प्रतीक है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
