स्नेह सम्मेलनों की मौत? जानिए कैसे खत्म हो रही परंपरा और क्यों नहीं बचा स्नेह सम्मेलन में स्नेह?
प्रवासी राजस्थानी समाज की पहचान रहे स्नेह सम्मेलन कैसे सादगी और आत्मीयता से निकलकर इवेंट कल्चर में बदल गए, इस विस्तृत रिपोर्ट में मनिष पालीवाल ने परंपरा, बदलाव, प्रायोजन संस्कृति और गांव से टूटते रिश्तों की पूरी कहानी को गहराई से उजागर किया है।

मुंबई।
राजस्थान की मिट्टी में पले-बढ़े लोगों ने जब रोज़गार की तलाश में अपने गांव-कस्बों से बाहर कदम रखा, तो वे केवल जीविका की चिंता लेकर नहीं निकले थे। उनके साथ उनकी बोली, रीति-रिवाज, खान-पान और आपसी अपनत्व भी परदेस पहुँचा। मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और दक्षिण भारत के अनेक शहरों में बसे प्रवासी राजस्थानी समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने के लिए जिन परंपराओं को सहेजा, उनमें सामुहिक मिलन सबसे सशक्त माध्यम रहा।
वर्ष भर मे मिलन का आयोजन कांलातर मे स्नेह सम्मेलन नाम से पुकारे जाने लगा। मिलन का वो दौर एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वह मंच था जहाँ बिखरे हुए गांव एक दिन के लिए फिर से बस जाया करते थे।
जब स्नेह सम्मेलन आत्मीयता का उत्सव था
आरंभिक दौर में स्नेह सम्मेलन मंदिरों, धर्मशालाओं या खुली चौपालों में आयोजित होते थे। न कोई दिखावा, न कोई भव्य मंच सादगी ही इसकी सबसे बड़ी पहचान थी।खाना बनाने से लेकर बैठने की व्यवस्था तक, हर काम समाज के लोग मिलकर करते थे। कोई दाल चढ़ाता, कोई बाटी बनाता, तो कोई मेहमानों की आवभगत में लगा रहता। महिलाएँ, बुजुर्ग और बच्चे सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते थे। उस समय मंच माला की जगह आपसी संवाद था—गांव की समस्याओं पर चर्चा, बुजुर्गों का मार्गदर्शन और युवाओं को संस्कार देने का प्रयास।
परदेस में गांव को जीवित रखने का माध्यम
रजवाड़ों के दौर मे रंगून (वर्तमान म्यांमार), कोलकाता और हैदराबाद जैसे शहरों में पहुचें मारवाड़ी लोगों द्वारा इसकी शुरुआत हुई और धीरे-धीरे यह परंपरा मुंबई तक पहुँची। स्नेह सम्मेलन प्रवासियों के लिए अपने गांव और जड़ों से जुड़े रहने का सबसे सशक्त माध्यम बना। एक दिन के लिए ही सही, लेकिन लोग अपनी पहचान को फिर से जी लिया करते थे।
सन 2000 के बाद बदलता स्वरूप
सन 2000 के बाद आर्थिक ताकत के चलते स्नेह सम्मेलनों का स्वरूप तेजी से बदलने लगा। आयोजन धार्मिक स्थलों से निकलकर होटलों, रिसॉर्ट्स और बड़े मैदानों तक पहुँच गए। भव्य पंडाल, आधुनिक साउंड सिस्टम, रंगारंग कार्यक्रम और मनोरंजन इसका मुख्य आकर्षण बनने लगे। और मुल उदेश्य गायब हो गए।
आज स्नेह सम्मेलन देखने में तो भव्य हैं, लेकिन इनकी आत्मा मर चुकी है
आपसी भाईचारे की जगह ‘इवेंट कल्चर’
अब स्नेह सम्मेलन आत्मीय मिलन कम और पूर्व-निर्धारित समारोह अधिक बनते जा रहे हैं। पूरा आयोजन इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के हवाले होता है। मंडल के सदस्य आयोजक कम और दर्शक अधिक नजर आते हैं।
पहले जो भोजन समाज के लोग मिलकर बनाते थे, वह अब ठेके पर तैयार होता है। पारंपरिक राजस्थानी स्वाद की जगह आधुनिक खान-पान ने ले ली है। राजस्थान का खान पान रस्म के लिए रखा जाता है, इससे वह अपनापन और सामूहिक श्रम की भावना कमजोर हुई है, जो कभी इन सम्मेलनों की जान हुआ करती थी।
चंदे से प्रायोजन तक का सफर
पहले स्नेह सम्मेलन समाज के छोटे-छोटे योगदान से आयोजित होते थे। हर व्यक्ति चंदा देता था उनकी भागीदारी और जिम्मेदारी तय होती थी । अब स्थिति यह है कि आयोजन का पूरा खर्च प्रायोजक परिवार या कुछ गिने-चुने लोग उठाने लगे हैं। इस पंरपरा के चलते सम्मान समारोह की नई रित शुरू हुई है जिसके कारण पुरे कार्यक्रम का केडिट प्रायोजक परिवार लेकर जाता है। प्रायोजक परिवार को खुश करने के लिए मंडल के सदस्य बडे बडे फोटो लगाने से लेकर तमाम जतन करते हैं जिसके कारण पुरा आयोजन सामुहिक कम व्यक्ति विशेष का ज्यादा लगता है। वही दुसरा पहलु यह है कि कभी-कभी आयोजन के लिए मंडलों के सदस्यों का सहयोग कम मिलता है और पूरी जिम्मेदारी प्रायोजक या लाभार्थी परिवार को ही निभानी पड़ती हैं जिसके चलते आपसी भाईचारा बढ़ने की जगह कम होता है l
इस बदलाव के कारण आम सदस्यो की जिम्मेदारी घट गई है और लोग इन सम्मेलनों में विवाह समारोह की तरह अपनी सुविधा के अनुसार आते-जाते हैं।
गांव के विकास पर चर्चा, पर क्रियान्वयन कम
कभी स्नेह सम्मेलन गांवों की समस्याओं और विकास योजनाओं पर गंभीर चर्चा का मंच हुआ करते थे। आज भी प्रस्ताव रखे जाते हैं, योजनाएं बनती हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में वे कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। विचार तो हैं, लेकिन सामूहिक संकल्प और अमल की कमी साफ दिखती है।
पद और प्रतिष्ठा की बढ़ती राजनीति
पहले स्नेह सम्मेलन में कोई अध्यक्ष या मंत्री नहीं होता था। सभी समान थे और सभी की भागीदारी आवश्यक मानी जाती थी। समय के साथ कार्यकारिणी, पद और संगठनात्मक ढांचे बने। कई जगह ये पद सेवा की बजाय प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गए हैं।
इसके चलते कुछ लोग ही सक्रिय रह जाते हैं और समाज का बड़ा हिस्सा केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित रह जाता है। आधुनिकता के नाम पर संगठन बनाए गए लेकिन 90% संगठन रजिस्टर्ड नहीं है और सिर्फ कागजों में चल रहे हैं, अगर यह संगठन रजिस्टर्ड होते तो इसका सरकारी लाभ लिया जा सकता था इस गंभीर भूल का खामियाजा आने वाली पीढ़ी को भुकतना पड़ेगा।
जड़ों की ओर लौटने की एक उम्मीद
इन तमाम बदलावों के बीच एक सकारात्मक पहल भी सामने आई है। कुछ समाजों/संगठनो ने अपने स्नेह सम्मेलन महानगरों से हटाकर गांवों में आयोजित करने शुरू किए हैं। खासकर गर्मियों में, जब अधिकांश प्रवासी गांव आते हैं, तब ऐसे आयोजन लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
आधुनिकता अपने आप में नकारात्मक नहीं है, लेकिन जब वह परंपरा की आत्मा को खो दे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।
स्नेह सम्मेलन की सफलता केवल भव्यता और मनोरंजन में नहीं, बल्कि आपसी स्नेह, सहभागिता और सामाजिक जिम्मेदारी में निहित है।
यदि समय रहते इस परंपरा की मूल भावना को फिर से केंद्र में नहीं लाया गया, तो स्नेह सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएंगे—जहाँ चमक तो होगी, लेकिन आत्मा नहीं।
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Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
