आवारा कुत्तों का आतंक: सुप्रीम कोर्ट की सिब्बल को सख्त टिप्पणी; 'किस कुत्ते का मूड कब बिगड़ जाए, किसे पता?'
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के आतंक पर हुई सुनवाई में जजों ने सख्त रुख अपनाते हुए कपिल सिब्बल की 'क्रूरता' वाली दलील को खारिज कर दिया। जस्टिस संदीप मेहता ने पूछा कि किस कुत्ते का मूड कब बिगड़ जाए, यह कौन जान सकता है? राजस्थान हाईकोर्ट के जजों के साथ हुए हादसों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने राज्यों को शेल्टर होम बनाने और हाईवे से आवारा पशुओं को हटाने के कड़े निर्देश दिए हैं।

Supreme Court hearing on stray dogs
Supreme Court hearing on stray dogs: देश की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों और मवेशियों के बढ़ते खौफ ने अब न्यायपालिका के गलियारों में भी चिंता की लहर पैदा कर दी है। बुधवार, 7 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में इस गंभीर मसले पर हुई सुनवाई के दौरान न केवल कानूनी दलीलें दी गईं, बल्कि जजों के निजी और डरावने अनुभव भी सामने आए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने इस मुद्दे की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए कहा कि सड़क पर घूमते इन बेसहारा जानवरों की वजह से पिछले 20 दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट के दो न्यायाधीश दुर्घटना का शिकार हुए हैं, जिनमें से एक जज अभी भी रीढ़ की हड्डी की गंभीर चोट से जूझ रहे हैं। न्यायालय का यह रुख स्पष्ट था कि अब मानवीय सुरक्षा को पशु अधिकारों के समान ही प्राथमिकता दी जाएगी।
सुनवाई के दौरान अदालत का माहौल तब तल्ख हो गया जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कुत्तों के प्रति 'क्रूर' न होने की दलील दी। सिब्बल ने सुझाव दिया कि आवारा कुत्तों की नसबंदी के बाद उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने तीखा तंज कसते हुए पूछा कि क्या अब सिर्फ कुत्तों की काउंसलिंग करना ही बाकी रह गया है ताकि वे किसी को न काटें। न्यायाधीश ने सिब्बल की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह केवल काटने का सवाल नहीं है, बल्कि इन कुत्तों की अचानक मौजूदगी से होने वाली भयानक सड़क दुर्घटनाओं का भी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि सुबह-सुबह किस कुत्ते का मूड कैसा है और वह कब हमलावर हो जाए, इसकी भविष्यवाणी भला कौन कर सकता है?
अदालत ने इस मामले में पूर्व के निर्देशों की याद दिलाते हुए दोहराया कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाकर निर्धारित आश्रयों में भेजा जाना अनिवार्य है। एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने 1400 किलोमीटर के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की है। हालांकि, जमीनी हकीकत अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है क्योंकि कई राज्यों में शेल्टर होम और स्टरलाइजेशन सेंटरों का भारी अभाव है। एमिकस क्यूरी ने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे बड़े राज्यों ने अब तक इस संबंध में अपना जवाब (हलफनामा) दाखिल नहीं किया है, जो प्रशासन की सुस्ती को दर्शाता है।
इस उच्च स्तरीय सुनवाई का अंत राज्यों को कड़ी चेतावनी के साथ हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आवारा पशुओं और कुत्तों का प्रबंधन अब केवल नगर निगमों का छोटा काम नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का एक बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन चुका है। न्यायालय ने रेलवे मंत्रालय को भी इस दायरे में शामिल करने की संभावनाओं पर विचार करने की बात कही है, क्योंकि रेलवे स्टेशनों पर भी यात्रियों की सुरक्षा खतरे में है। यह मामला अब उस निर्णायक मोड़ पर है जहाँ पशु प्रेम और मानव जीवन की सुरक्षा के बीच एक स्पष्ट और सुरक्षित रेखा खींचना अनिवार्य हो गया है, ताकि भविष्य में और किसी को अपनी जान या सेहत दांव पर न लगानी पड़े।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
