चित्तौड़गढ़: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरे वकील, रात्रि कालीन अदालतों के विरोध में सौंपा ज्ञापन
चित्तौड़गढ़ जिला अभिभाषक संस्थान ने राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा रात्रि कालीन अदालतों के संचालन और शनिवार के अवकाश में कटौती के निर्णय के विरोध में मुख्य न्यायाधिपति के नाम ज्ञापन सौंपा। अध्यक्ष नरेश शर्मा के नेतृत्व में वकीलों ने 5 कार्य दिवस और रात्रि अदालतों पर पुनर्विचार की मांग की है। जानें इस विरोध प्रदर्शन के मुख्य कारण और शामिल अधिवक्ताओं के नाम।

चित्तौड़गढ़। न्याय के मंदिर में कार्यप्रणाली को लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा लिए गए हालिया निर्णयों ने कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चित्तौड़गढ़ जिला अभिभाषक संस्थान ने इन निर्णयों को व्यवहारिक चुनौतियों से पूर्ण बताते हुए अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा रात्रि कालीन अदालतों के संचालन और प्रत्येक माह के दो शनिवार को कार्य दिवस घोषित करने के फैसले ने अधिवक्ताओं को आंदोलन की राह पर ला खड़ा किया है। वकीलों का तर्क है कि इस प्रकार के बदलाव न केवल न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बनाएंगे, बल्कि अधिवक्ताओं के कार्य-जीवन संतुलन को भी बुरी तरह प्रभावित करेंगे।
विवाद की जड़ उच्च न्यायालय का वह हालिया आदेश है, जिसमें न्यायिक घंटों को बढ़ाने और अवकाश के दिनों में कटौती करने का प्रावधान किया गया है। इस संबंध में जिला अभिभाषक संस्थान के बैनर तले बड़ी संख्या में अधिवक्ता एकत्रित हुए और जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से मुख्य न्यायाधिपति, राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पूर्व राजस्थान बार काउंसिल और जिला स्तर के पदाधिकारियों से विचार-विमर्श करना अनिवार्य होना चाहिए था। अधिवक्ताओं ने अपनी मांग दोहराते हुए कहा कि रात्रि कालीन अदालतों के निर्णय को तुरंत वापस लिया जाए और अधीनस्थ न्यायालयों में सप्ताह में केवल पांच कार्य दिवस की व्यवस्था लागू की जाए।
इस विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने के दौरान बार एसोसिएशन की एकजुटता स्पष्ट नजर आई। संस्थान के अध्यक्ष नरेश शर्मा और उपाध्यक्ष चांदनी बैरागी के नेतृत्व में न्यायिक शुचिता और अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा का संकल्प लिया गया। इस अवसर पर लोकेन्द्र सिंह राणावत, कमलेश सुखवाल, विशाल सिंह भाटी और रोहित खटीक सहित कार्यकारिणी के सदस्यों ने सक्रिय भूमिका निभाई। साथ ही, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुभव और युवा वकीलों के जोश ने इस मांग को और बल प्रदान किया।
ज्ञापन सौंपने वालों में वरिष्ठ अधिवक्ता लक्ष्मीलाल पोखरना, छोगालाल डाड, जगदीशचन्द्र शर्मा, रामेश्वरलाल तोतला, रमेशचन्द्र दशोरा, सुरेन्द्र नाथ योगी, एसपी सिंह राठौड, प्रदीप काबरा, शेलेन्द्र सिंह राव, ईनायत अली, गुलशेर अली, भेरूदास वैष्णव, सावन श्रीमाली, महिपाल सिंह पायरी, मालम सिंह पंवार, जेपी नेनवा, मदन त्रिपाठी, अल्पेश पुरी गोस्वामी, दिलीप तोतला, ललित लढ्ढा, अब्दुल सत्तार, किशन सिंह गार्डन, पंकज टेलर, मुकेश तोलम्बिया, यास्मीन शेख, ललित जोशी, अफजल मोहम्मद शेख, नागेन्द्र सिंह झाला, नितिन चावत, आदित्य राय चौधरी, अजय विक्रम सिंह राठौड, कर्मराज प्रजापत, संदीप सेठिया, धर्मेन्द्र जैन, राधेश्याम तेली, लोकेश मीणा, दिनेश खटीक, गिरीश दिक्षित, गणपत मीणा, रघुनन्दन दाधीच, पीयुष मण्डोवरा, प्रभुलाल गुर्जर और प्रवीण कनौजिया सहित दर्जनों कानूनविद मौजूद रहे।
अभिभाषक संस्थान का यह कदम प्रदेशव्यापी न्यायिक असंतोष का एक हिस्सा माना जा रहा है। वकीलों का मानना है कि यदि प्रशासन ने उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया, तो यह विरोध आने वाले समय में और प्रखर हो सकता है। अब सभी की नजरें जोधपुर उच्च न्यायालय के रुख पर टिकी हैं कि क्या वह अपने प्रशासनिक निर्णयों में अधिवक्ताओं की सुविधा और सुझावों को जगह देता है या नहीं।

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