जब आम बजट से अलग पेश होता था रेल Budget; 92 साल की इस परंपरा को क्यों लगा ब्रेक? जाने विस्तार से
भारत में 92 साल तक अलग पेश होने वाला रेल बजट 2017 में आम बजट में शामिल कर दिया गया। जानिए अंग्रेजों के दौर में शुरू हुई इस परंपरा का इतिहास, इसे खत्म करने की वजहें, NITI आयोग की भूमिका और इससे सरकार व रेलवे को हुए प्रमुख फायदे।

history of separate railway budget : देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला आम बजट एक बार फिर सुर्खियों में है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को देश का आम बजट पेश करेंगी, जो उनके कार्यकाल का लगातार नौवां बजट होगा। बजट से हर वर्ग और हर सेक्टर को बड़ी उम्मीदें हैं। इसी बीच बजट से जुड़ी एक ऐसी ऐतिहासिक परंपरा फिर चर्चा में है, जो दशकों तक चली, लेकिन अब इतिहास बन चुकी है—अलग रेल बजट की परंपरा।
अंग्रेजों के दौर में शुरू हुई रेल बजट की परंपरा :
आज भले ही रेल बजट आम बजट का हिस्सा हो, लेकिन कभी इसे अलग से पेश किया जाता था।
इस परंपरा की शुरुआत 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उस समय गठित एक विशेष समिति ने तर्क दिया था कि रेलवे का आकार, खर्च और आय इतनी बड़ी है कि इसे सामान्य बजट के दायरे में समाहित करना व्यावहारिक नहीं होगा।
आजादी के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही। 1947 से लेकर 2016 तक, यानी पूरे 92 वर्षों तक रेल बजट अलग से पेश होता रहा। इस दौरान रेल मंत्री, आम बजट से कुछ दिन पहले रेलवे की आय, व्यय, यात्री किराया और माल भाड़े से जुड़ी विस्तृत जानकारी संसद के सामने रखते थे।
क्यों खत्म हुई दशकों पुरानी परंपरा ?
वित्त वर्ष 2016-17 तक रेल बजट अलग पेश किया गया, लेकिन 2017 में यह परंपरा समाप्त हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने रेलवे बजट को आम बजट में विलय करने का फैसला किया।
इस बदलाव की नींव 2016 में NITI आयोग के तहत गठित अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों से पड़ी। समिति ने अपनी रिपोर्ट और शोध पत्र में कहा कि—
- भारत दुनिया का इकलौता देश है, जहां अब भी अलग रेल बजट पेश किया जा रहा था।
- आधुनिक सार्वजनिक वित्त व्यवस्था में इसका कोई ठोस औचित्य नहीं बचा है।
- रेलवे की वित्तीय स्थिति को यूनियन बजट में शामिल करने से सरकारी खर्च और आय की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।
सरकार और संसद में कैसे हुआ फैसला :
- समिति की सिफारिशों पर सरकार के भीतर गहन चर्चा हुई।
- तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने प्रस्ताव का समर्थन किया।
- इसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मुद्दे को संसद में रखा।
राज्यसभा में बहस के बाद 2017-18 का पहला एकीकृत आम बजट पेश किया गया, जिसके साथ ही अलग रेल बजट की परंपरा औपचारिक रूप से समाप्त हो गई।
रेल बजट को आम बजट में शामिल करने के फायदे :
रेल बजट के विलय से सरकार को कई स्तरों पर लाभ हुआ—
- बजट की तैयारी और संसद में चर्चा में लगने वाला समय कम हुआ।
- रेलवे द्वारा सरकार को दिया जाने वाला डिविडेंड समाप्त हुआ, जिससे वित्तीय बोझ घटा।
- रेलवे, सड़क और जलमार्ग जैसे परिवहन क्षेत्रों में बेहतर समन्वय संभव हुआ।
- इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग को एक यूनिफाइड फ्रेमवर्क के तहत लाया गया।
केंद्र सरकार की आय और व्यय एक ही दस्तावेज में दिखने से पारदर्शिता बढ़ी और निवेशकों व संसद के लिए वित्तीय समीक्षा आसान हुई।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
