हिजाब विवाद का नया मोड़: सरकारी नौकरी और कॉलेज के बीच फंसी कहानी
बिहार में हिजाब विवाद तब उभरा जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नई नियुक्त डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब हटाया। प्रिंसिपल की सार्वजनिक अपील के बाद डॉक्टर नुसरत को या तो सरकारी नौकरी ज्वाइन करनी है या कॉलेज में अध्ययन फिर से शुरू करना है। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक प्रोटोकॉल पर गहरी बहस खड़ी कर रहा है।

नितीश कुमार बुरखा विवाद
बिहार के चिकित्सा जगत में हिजाब को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सरकारी नियुक्ति पत्र वितरण समारोह के दौरान नई नियुक्त डॉक्टर नुसरत परवीन की हिजाब या नक़ाब हटाया, जिसे वीडियो में कैद कर लिया गया और सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किया गया। यह घटना न केवल राजनीतिक गलियारों में बल्कि आम जनता के बीच भी तीखी बहस का कारण बनी है।
इस विवाद के बाद डॉक्टर नुसरत परवीन ने अब तक अपने पद पर रिपोर्ट नहीं की है और न ही कॉलेज में अध्ययन के लिए उपस्थित हुई हैं। इसी बीच, गवर्नमेंट तिब्बी कॉलेज एवं हॉस्पिटल के प्रिंसिपल प्रो. (डॉ.) महफ़ूज़ुर रहमान ने सार्वजनिक अपील की है, जिसमें उन्होंने नुसरत परवीन से कहा कि वे या तो अपने कॉलेज अध्ययन को पुनः शुरू करें या फिर सरकारी नौकरी में शामिल हों। प्रिंसिपल ने स्पष्ट किया कि यह एक विशेष मामला है और नियुक्ति में शामिल होने की समयसीमा बढ़ाई जा सकती है।
वास्तव में, डॉक्टर नुसरत परवीन की अनुपस्थिति ने प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी नियमों के अनुसार, नियुक्ति पत्र प्राप्त करने के बाद उम्मीदवार को निर्धारित समय में पद ग्रहण करना अनिवार्य होता है। इस मामले में नुसरत परवीन के द्वारा अब तक जॉइन न करना प्रशासनिक प्रक्रिया और सरकारी नियमानुसार गंभीर रूप से देखा जा रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इस घटना का व्यापक प्रभाव पड़ा है। विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के इस कदम की आलोचना की है और इसे सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है। वहीं, राज्य के गवर्नर ने मुख्यमंत्री के इस कदम को पारिवारिक दृष्टिकोण से उचित ठहराया। बिहार की जनता और राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे ने गहन बहस छेड़ दी है, जिसमें धर्म, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी प्रोटोकॉल के मुद्दे जुड़ गए हैं।
साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना की प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्षी नेताओं ने डॉक्टर नुसरत परवीन को अन्य विकल्प प्रदान करने और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह मामला यह दर्शाता है कि सरकारी नियुक्तियों और धार्मिक प्रतीकों को लेकर निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी संवेदनशील होते हैं।
इस विवाद की गहनता और प्रिंसिपल की अपील का संदेश स्पष्ट है—डॉ. नुसरत परवीन को अपने करियर के प्रति निर्णय लेने की आवश्यकता है। या तो वे सरकारी नौकरी में शामिल हों और जिम्मेदारी निभाएं, या फिर अध्ययन की राह चुनें। इस घटना ने बिहार में धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक प्रोटोकॉल और व्यक्तिगत सम्मान के मुद्दों को केंद्र में ला दिया है, जो आने वाले समय में शिक्षा और प्रशासनिक निर्णयों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
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Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
