क्या 'Pink' कलर सिर्फ लड़कियां पहन सकती हैं? अगर नहीं, तो क्या है इस रंग का इतिहास
गुलाबी रंग को लड़कियों से जोड़ने की धारणा हमेशा से नहीं थी। यह लेख बताता है कि कैसे बीसवीं सदी की शुरुआत में गुलाबी लड़कों का रंग माना जाता था, फिर बाज़ार और समाज ने इसकी पहचान बदली और आज यह रंग फिर से लैंगिक सीमाओं को चुनौती दे रहा है।

गुलाबी और जेंडर की कहानी
गुलाबी रंग को आज पश्चिमी समाज में स्त्रैणता का प्रतीक माना जाता है। बच्चों के कपड़ों से लेकर खिलौनों और विज्ञापनों तक, गुलाबी का सीधा संबंध लड़कियों से जोड़ दिया गया है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह धारणा उतनी स्वाभाविक या पुरानी नहीं जितनी आज प्रतीत होती है। वास्तव में, बीसवीं सदी की शुरुआत में गुलाबी रंग लड़कों से जुड़ा हुआ माना जाता था। यह कहानी न केवल रंगों की बदलती पहचान की है, बल्कि समाज, बाज़ार और संस्कृति के गहरे अंतर्संबंधों को भी उजागर करती है।
बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में बच्चों के लिए रंगों का स्पष्ट लैंगिक विभाजन मौजूद नहीं था। उस दौर में हल्के और पेस्टल रंगों को सामान्य माना जाता था और उनका उपयोग लड़के-लड़कियों दोनों के लिए किया जाता था। कई फैशन गाइड्स और खुदरा व्यापार से जुड़े दस्तावेज़ों में यह उल्लेख मिलता है कि गुलाबी, जो लाल का हल्का रूप है, को शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता था। इसी कारण इसे लड़कों के लिए अधिक उपयुक्त समझा जाता था। इसके विपरीत, नीला रंग सौम्यता और शांति से जोड़ा जाता था, जिसे लड़कियों के लिए सही माना गया।
हालांकि, यह संतुलन लंबे समय तक नहीं टिक सका। बीसवीं सदी के मध्य आते-आते, विशेष रूप से 1940 और 1950 के दशक में, रंगों की यह परिभाषा धीरे-धीरे उलटने लगी। औद्योगिक उत्पादन के विस्तार, उपभोक्ता संस्कृति के उभार और विज्ञापन उद्योग की भूमिका ने इसमें निर्णायक योगदान दिया। बड़े पैमाने पर तैयार किए जा रहे कपड़ों और उत्पादों को बेचने के लिए बाज़ार को स्पष्ट वर्गीकरण की आवश्यकता थी। इसी प्रक्रिया में गुलाबी को स्त्रैण और नीले को पुरुषोचित रंग के रूप में स्थापित कर दिया गया। यह बदलाव किसी सामाजिक कानून या वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित नहीं था, बल्कि बाज़ार की रणनीतियों और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का परिणाम था।
यह भी उल्लेखनीय है कि रंगों से जुड़ी ये धारणाएं हर संस्कृति में समान नहीं रहीं। यूरोप के कुछ हिस्सों, विशेष रूप से जर्मनी में, गुलाबी को लंबे समय तक पुरुषों का रंग माना जाता रहा। कई समाजों में लाल, गुलाबी और गहरे रंगों को साहस और वीरता से जोड़कर देखा गया, जो पारंपरिक रूप से पुरुषों के गुण माने जाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि रंगों का अर्थ स्थायी या सार्वभौमिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से निर्मित होता है।
आधुनिक समय में यह बहस एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। फैशन, कला और लोकप्रिय संस्कृति में गुलाबी रंग को फिर से लैंगिक सीमाओं से मुक्त करने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं। कई पुरुष फैशन डिज़ाइनर, खेल जगत की टीमें और सार्वजनिक हस्तियां गुलाबी रंग को आत्मविश्वास और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के प्रतीक के रूप में अपना रही हैं। यह प्रवृत्ति समाज में गहराई से जमी लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देती है।
गुलाबी रंग की यह ऐतिहासिक यात्रा यह दिखाती है कि जो बातें आज “स्वाभाविक” या “परंपरागत” मानी जाती हैं, वे अक्सर समय और परिस्थितियों की देन होती हैं। रंगों से जुड़ी लैंगिक धारणाएं जैविक नहीं, बल्कि सामाजिक निर्माण हैं, जो बदलती सोच के साथ रूपांतरित होती रहती हैं। गुलाबी का लड़कों से लड़कियों तक और अब फिर से लैंगिक तटस्थता की ओर बढ़ना, समाज के बदलते दृष्टिकोण का एक सशक्त उदाहरण है।
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Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
