भरतपुर: खेती की नई क्रांति, चिकसाना में किसानों को मिला नैनो यूरिया और डीएपी का 'सुरक्षा कवच'
भरतपुर के चिकसाना में इफको द्वारा आयोजित किसान सभा में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के क्रांतिकारी उपयोग की जानकारी दी गई। क्षेत्रीय अधिकारी श्याम सुन्दर और सचिव सुरेंद्र सिंह की उपस्थिति में किसानों को कम लागत में 50% डीएपी बचाने और बेहतर फसल पैदावार के वैज्ञानिक तरीके बताए गए। आधुनिक कृषि तकनीक से किसानों को सशक्त बनाने की यह एक अनूठी पहल है।

भरतपुर। आधुनिक कृषि तकनीकों के समावेश से किसानों की तकदीर बदलने के संकल्प के साथ भरतपुर के ग्राम चिकसाना में एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा गया। ब्लॉक सेवर के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र में आयोजित एक विशेष किसान सभा ने क्षेत्र के अन्नदाताओं को भविष्य की खेती के प्रति जागरूक किया। कृषि जगत के दिग्गज संस्थान इफको द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में तकनीक और परंपरा का अद्भुत मेल देखने को मिला, जहाँ नैनो उत्पादों के माध्यम से लागत कम करने और पैदावार बढ़ाने का मंत्र साझा किया गया।
इस विशेष आयोजन में महिला बहुउददेशीय सहकारी समिति चिकसाना के सचिव सुरेंद्र सिंह ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई, जिन्होंने स्थानीय स्तर पर किसानों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। इफको की ओर से क्षेत्रीय अधिकारी श्याम सुन्दर और एमडीई राम किशोर गोस्वामी ने मुख्य वक्ता के रूप में मोर्चा संभाला। अधिकारियों ने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ किसानों को समझाया कि कैसे पारंपरिक यूरिया और डीएपी के भारी-भरकम कट्टों के बजाय नैनो तकनीक की छोटी बोतलें अधिक प्रभावी साबित हो रही हैं।
राम किशोर गोस्वामी ने बीज उपचार की महत्ता पर जोर देते हुए बताया कि यदि किसान फसल की बुआई के समय 5 मिली प्रति किलोग्राम की दर से नैनो डीएपी से बीजों को उपचारित करते हैं, तो अंकुरण न केवल बेहतर होता है बल्कि फसल की नींव भी मजबूत होती है। वहीं, जब फसल 30 से 35 दिन की हो जाए, तब 5 मिली प्रति लीटर पानी के हिसाब से इसका छिड़काव मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में क्रांतिकारी बदलाव लाता है। इस पद्धति को अपनाकर किसान दानेदार डीएपी की खपत में 50 प्रतिशत तक की भारी बचत कर सकते हैं, जो न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है।
कार्यक्रम के दौरान नैनो यूरिया और सागरिका के संतुलित प्रयोग पर भी विशेष चर्चा हुई। क्षेत्रीय अधिकारी श्याम सुन्दर ने जानकारी दी कि फसल के 30 से 35 दिन की अवस्था में पहुंचने पर नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का संयुक्त छिड़काव एक शक्तिशाली 'बूस्टर' की तरह काम करता है। इसके अतिरिक्त, पहली सिंचाई के समय सागरिका का उपयोग करने की सलाह दी गई, ताकि पौधों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके। महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि किसान इन नैनो उत्पादों के साथ अन्य खरपतवार नाशक और कीटनाशक दवाओं का भी सुरक्षित रूप से उपयोग कर सकते हैं, जिससे उनका समय और श्रम दोनों बचेंगे।
यह आयोजन केवल एक जानकारी सत्र मात्र नहीं था, बल्कि यह भरतपुर के किसानों को स्वावलंबन की राह दिखाने वाला एक सशक्त मंच साबित हुआ। आधुनिक तकनीक के इस प्रसार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसान वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हैं, तो कम लागत में उन्नत कृषि का सपना अब हकीकत के बेहद करीब है।

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