बयाना के निजी महाविद्यालय में आयोजित एनएसएस शिविर के तीसरे दिन कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध छात्राओं ने आवाज उठाई। डॉ. भरत कुमार और विशेषज्ञों ने गिरते लिंगानुपात व संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा की, वहीं पोस्टर प्रतियोगिता के जरिए 'बेटी बचाओ' का संदेश दिया गया। शिवानी, कनिष्का और मंजू अग्रवाल सहित पूरी टीम ने सामाजिक कुरीतियों को मिटाने का संकल्प लिया।

बयाना। समाज में जड़ें जमा चुकी पुरुषवादी मानसिकता और गिरते लिंगानुपात की गंभीर चुनौती को केंद्र में रखते हुए बयाना कस्बे के एक निजी महाविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के सात दिवसीय विशेष शिविर के तीसरे दिन वैचारिक क्रांति का शंखनाद हुआ। सोमवार को आयोजित इस सत्र में 'कन्या भ्रूण हत्या' जैसे संवेदनशील और ज्वलंत सामाजिक मुद्दे पर गहन विमर्श किया गया, जिसमें छात्राओं ने अपनी कला और तर्कों के माध्यम से समाज की सोई हुई चेतना को जगाने का प्रयास किया।

शिविर के दौरान "कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जागरूकता" विषय पर केंद्रित त्रिकोणीय गतिविधियों—पोस्टर प्रतियोगिता, वाद-विवाद और संगोष्ठी—का आयोजन हुआ। इस अवसर पर कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. भरत कुमार ने समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करते हुए कहा कि कन्या भ्रूण हत्या की मूल जड़ 'बेटे की चाहत' में छिपी है। उन्होंने रेखांकित किया कि आज भी समाज में पुत्र को आय का स्रोत और पुत्री को महज उपभोक्ता समझने की संकीर्ण दृष्टि व्याप्त है। इसी पुरुष प्रधान सोच ने महिलाओं को असमानता की बेड़ियों में जकड़ रखा है। डॉ. कुमार ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि पिछले तीन दशकों से जारी इस कुप्रथा के दुष्परिणाम अब असंतुलित लिंगानुपात और विवाह योग्य युवकों के लिए वधुओं के संकट के रूप में सामने आने लगे हैं। यह न केवल मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि वैज्ञानिक तकनीकों का घृणित दुरुपयोग और लैंगिक भेदभाव की पराकाष्ठा है।

संवैधानिक और कानूनी पक्ष को मजबूती से रखते हुए एनएसएस स्वयंसेविका शिवानी और कनिष्का ने भारतीय संविधान के सुरक्षा कवच की चर्चा की। उन्होंने बताया कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है, वहीं अनुच्छेद 51ए (ई) प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करें। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के उन कड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया, जो जन्म पूर्व लिंग परीक्षण को एक दंडनीय अपराध बनाते हैं।

बौद्धिक विमर्श के साथ-साथ रचनात्मकता के मंच पर भी छात्राओं ने अपनी प्रतिभा दिखाई। एनएसएस प्रभारी मंजू अग्रवाल ने प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि पोस्टर प्रतियोगिता में लक्ष्मी बाई सदन की स्वयंसेविका ने प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी कला से बेटी बचाने का संदेश दिया, जबकि नेहरू सदन की स्वयंसेविकाएं द्वितीय स्थान पर रहीं। इस महत्वपूर्ण वैचारिक सत्र में प्रवक्ता डॉ. दिलीप गुप्ता, हिमांशी, सुमन मंगल, पूजा अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेविकाएं उपस्थित रहीं, जिन्होंने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लिया। यह कार्यक्रम न केवल एक चर्चा तक सीमित रहा, बल्कि इसने युवा पीढ़ी को एक ऐसी सामाजिक कुरीति के विरुद्ध खड़ा किया जो राष्ट्र के भविष्य को खोखला कर रही है।

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