गैलीपोली अभियान : प्रथम विश्व युद्ध की वह काली निर्णायक त्रासदी; जिसने बदल दी सैन्य इतिहास की दिशा
9 जनवरी 1916 को समाप्त हुआ 'गैलीपोली अभियान' प्रथम विश्व युद्ध का सबसे विवादित अध्याय है। विंस्टन चर्चिल की रणनीतिक विफलता और मुस्तफा कमाल अतातुर्क के साहस के बीच हुए इस युद्ध में 5 लाख सैनिक हताहत हुए। जानिए कैसे इस खूनी जंग ने आधुनिक तुर्की की नींव रखी और ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठा को हिलाकर रख दिया।

Battle of Gallipoli 1915 history in Hindi : प्रथम विश्व युद्ध के काले अध्यायों में एक ऐसी तारीख दर्ज है, जो साहस और विफलता की पराकाष्ठा का प्रतीक है। आज से ठीक 110 साल पहले, 9 जनवरी 1916 को गैलीपोली प्रायद्वीप पर मित्र राष्ट्रों का वह महत्वाकांक्षी सैन्य अभियान औपचारिक रूप से समाप्त हुआ था, जिसने आधुनिक युद्ध कला के इतिहास को बदल कर रख दिया। यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि डार्डानेल्स जलडमरूमध्य की लहरों पर लिखी गई एक ऐसी खूनी दास्तान थी, जिसमें विंस्टन चर्चिल की दूरदर्शी रणनीति और तुर्की के मुस्तफा कमाल अतातुर्क के अदम्य साहस के बीच विनाशकारी टक्कर हुई थी।
इस सैन्य महासंग्राम की नींव 1915 में रखी गई थी, जब ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड (ANZAC) की एलायड ताकतों ने ऑटोमन साम्राज्य को युद्ध से बाहर करने और रूस को रसद पहुँचाने के लिए कुस्तुनतुनिया पर कब्जे की योजना बनाई। ब्रिटेन के फर्स्ट लॉर्ड ऑफ एडमिरल्टी विंस्टन चर्चिल इस योजना के सबसे बड़े पैरोकार थे। फरवरी 1915 में शुरू हुआ नौसैनिक हमला उस समय आपदा में बदल गया जब तुर्की द्वारा बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों ने मित्र राष्ट्रों के शक्तिशाली युद्धपोतों को मलबे में तब्दील कर दिया। इसके बाद 25 अप्रैल 1915 को पैदल सेना को तटों पर उतारा गया, लेकिन वहाँ ऊँचाई वाले स्थानों पर तैनात तुर्की सेना ने मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में ऐसा अभेद्य चक्रव्यूह रचा कि मित्र राष्ट्रों के सैनिक तटों पर ही फंस कर रह गए।
गैलीपोली की खाइयां महज सैन्य मोर्चा नहीं, बल्कि बीमारियों और मौत का अड्डा बन चुकी थीं। कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित विरोधी सेनाओं के बीच यह जंग आठ महीनों तक खिंचती चली गई। भीषण गर्मी, पानी की घोर किल्लत और पेचिश जैसी महामारियों ने हथियारों से ज्यादा तबाही मचाई। इस दौरान करीब पांच लाख सैनिकों की जान गई या वे घायल हुए, जिनमें दोनों पक्षों का बराबर का नुकसान था। अंततः, जब जीत की कोई उम्मीद शेष नहीं रही, तो ब्रिटिश नेतृत्व ने पीछे हटने का कठिन निर्णय लिया। दिसंबर 1915 से शुरू हुई यह वापसी 9 जनवरी 1916 को बिना किसी अतिरिक्त हताहत के पूरी हुई, जिसे विडंबनापूर्ण रूप से इस पूरे असफल अभियान का सबसे सफल सैन्य ऑपरेशन माना गया।
इस विफलता का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव अत्यंत गहरा रहा। विंस्टन चर्चिल को अपनी प्रतिष्ठा गंवानी पड़ी और उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए 'एन्ज़ैक' (ANZAC) सैनिकों का बलिदान एक नई राष्ट्रीय चेतना का आधार बना। सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव तुर्की पर पड़ा, जहाँ इस जीत ने मुस्तफा कमाल अतातुर्क को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित किया, जिसने आगे चलकर आधुनिक तुर्की गणराज्य की नींव रखी। गैलीपोली का यह मैदान आज भी उन गुमनाम सैनिकों की याद दिलाता है, जिनका बलिदान सैन्य रणनीतियों की गलतियों की भेंट चढ़ गया।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
